Breaking News
  • Breaking News Will Appear Here

जाटलैंड बहायेगा यूपी में चुनावी बयार , गठबंधन का भी होगा टेस्ट

 Utkarsh Sinha |  2017-01-17 12:00:19.0

जाटलैंड बहायेगा यूपी में चुनावी बयार , गठबंधन का भी होगा टेस्ट

उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. उत्तर प्रदेश में नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही यूपी में चुनावी बयार तेज हो गयी है. हर बार की तरह यूपी के सियासी आँगन में भी पछुआ बयार ही बहेगी. पश्चिमी यूपी में पहले चरण में वोट पड़ने हैं और यही वह मैदान है जहाँ समाजवादी पार्टी -कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन का सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना भी मानी जा रही है. जाट राजनीति इस इलाके की नब्ज तय करती है.पश्चिम यूपी के 27 जिलों में लगभग 56 सीटों पर जाट और गुर्जर मतदाता ही निर्णायक फैसला करते हैं.बीते विधान सभा चुनावो में जब पूरे सूबे में अखिलेश लहर चली थी तब भी बीएसपी ने इस इलाके में कड़ी टक्कर दी थी.

2012 के चुनावो में इस इलाके में सपा को 24, बीएसपी को 23, बीजेपी को 13, आरएलडी को 9 और कांग्रेस को 5 सीटें मिली थीं. मगर 2013 के सांप्रदायिक दंगो के बाद यह इलाका पूरी तरह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की चपेट में आ गया नतीजतन लोकसभा चुनावो में इस इलाके में भाजपा ने दुसरे दलों का सफाया कर दिया. विधान सभा में मजबूत दिख रही बसपा का सूपड़ा साफ़ हो गया और अजीत सिंह का जाट–मुस्लिम वोटबैंक इस तरह बिखरा की अजीत सिंह के राजनैतिक अस्तित्व पर ही सवाल खड़े हो गए.

पश्चिमी यूपी में कद्दावर नेताओं की भी कमी नहीं रही है. कभी चौधरी चरण सिंह की तूती इस इलाके में बोलती थी. किसानो की राजनीति करने वाले चरण सिंह ने "अजगर" नाम से सोशल इंजीनियरिंग की थी जिसमे अहीर, जाट, गुजर और राजपूत एक साथ आते थे . मगर बड़ी संख्या में मौजूद मुस्लिम वोटर भी उस वक्त खुद को जाट, और गुज़र के बतौर ही पहचानना पसंद करते थे. जाटो में भी मुसलमान थे और गुजरो में भी मुसलमान थे. तब अस्तित्व में रही जनसंघ अपना सारा जोर लगाने के बाद भी इस इलाके में हिंदुत्व की राजनीति को आधार नहीं दे सकी थी.

राम मंदिर आन्दोलन के समय यह इलाका पहली बार साम्प्रदायिकता की चपेट में आया . चौधरी चरण सिंह का देहावसान हो चुका था और उनकी विरासत सम्हाले अजीत सिंह अपनी पकड़ नहीं कायम रख सके और मुलायम सिंह ने उनकी जमीन खींच ली. कभी विधान सभा में 90 सीटे हासिल करने वाले अजीत सिंह फिलहाल 9 सीटो पर हैं. अगस्‍त 2013 में मुज़फ्फरनगर के दंगे के बाद से जाट और मुस्‍लिमों में जबरदस्त बिखराव आ गया मगर केंद्र में मोदी की सरकार बनने के बाद हरियाणा में जाट आन्दोलन को भाजपा सरकार ने कुचला और चौधरी चरण सिंह का स्मारक बनाने के प्रस्ताव को नाकारा उसके बाद अजीत सिंह के प्रति जाटो में एक बार फिर सहानुभूति बढ़ी है. मुजफ्फरनगर दंगो के बाद से टूटी सामाजिक संरचना भी एक बार फिर समरसता की और बढ़ी है. जाट और मुस्लिम के बीच बनी खाई के कम होने का लाभ भी अजीत को मिलेगा.

मंडल और कमंडल की राजनीति के उभार बाद कांग्रेस लगातार हाशिये पर जाती रही,, हालाकि पहले रशीद मसूद और उसके बाद इमरान मसूद और पंकज मालिक फिलहाल इस इलाके में कांग्रेस का झंडा उठाये हुए हैं . इसी तरह समाजवादी पार्टी भी 2012 के चुनावो में भी महज 24 सीट ही पा सकी थी. मुजफ्फरनगर दंगो के बाद अखिलेश सरकार के खिलाफ माहौल बना था. समाजवादी पार्टी को भी इस इलाके में कड़ी चुनौती का सामना करना तय था. अखिलेश खेमें को इस बात का अंदाजा बखूबी था इसलिए वह पहले भी गठबंधन के संकेत दे रही थी.

विधानसभा चुनावों में बीजेपी की स्थिति पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हालाकि बेहतर नहीं रही थी और इस इलाके में उसे 13 सीटें मिली थी, मगर 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने एकतरफा जीत हासिल की थी . भाजपा के लिए भी राहे आसान नहीं है. उसके सांसदों का काम जनता को प्रभावित नहीं कर सका है और उसके पास एक बार फिर मोदी के करिश्मे के अलावा हिन्दू वोटो के ध्रुवीकरण का ही सहारा है.

मायावती पूरे प्रदेश में दलित-मुस्लिम गठजोड़ साधने में लगी हुई हैं. बीते विधानसभा चुनावो में उन्हें 23 सीते मिली थी मगर उनके कई सिटिंग विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं. मायावती की रणनीति का कुल आधार मुस्लिम वोटो का सपा से छिटकाना ही है. इसी रणनीति पर चलते हुए मायावती ने बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं.

यूपी विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और राष्‍ट्रीय लोकदल के बीच गठबंधन का फार्मूला लगभग तय हो चुका है , अब महज सीटो की घोषणा होनी बाकी है. सपा और कांग्रेस में गठबंधन की बातें लंबे समय से चल रही थीं, लेकिन पार्टी में मचे सियासी घमासान की वजह से ऐसा नहीं हो पा रहा था.

इस गठबंधन के बाद समीकरण पूरी तरह से बदल सकते हैं. सपा, कांग्रेस और रालोद के एक साथ आने के बाद मतों के बटने का खतरा कम हो गया है, साथ ही इलाके के मुस्लिमो को एकजुट रखने में मदद मिलेगी. इस गठबंधन के रणनीतिकारो का अनुमान है कि चौधरी चरण सिंह का "अजगर" फिर से नए रूप में आ सकता है.

पश्चिम का यह इलाका बड़े नेताओं से भरा पड़ा है. मायावती, कल्याण सिंह, जनरल वी के सिंह, अजीत चौधरी, जयंत चौधरी, संगीत सोम, रामवीर उपाध्याय, सुरेश राणा, जगदीश सिंह राणा, राजेन्द्र सिंह राणा, राजा महेंद्र अरिदमन सिंह, ठाकुर मूलचंद, ठाकुर जयवीर सिंह, सर्वेश सिंह, विमला सोलंकी, महावीर राणा, आशु मलिक, गेंदालाल चौधरी और प्रताप सिंह बघेल जैसे नेता इसी इलाके से आते हैं और आने वाले दिनों में इनके प्रभाव का आंकलन भी होगा.


Tags:    

  Similar Posts

Share it
Share it
Share it
Top