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कितना असर बचा है इमामत का सियासत में, दिखेगा शनिवार को

 Utkarsh Sinha |  2017-02-10 12:34:29.0

कितना असर बचा है इमामत का सियासत में, दिखेगा शनिवार को

उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. यूपी के विधानसभा के पहले चरण के ठीक पहले फ़तवो और अपीलों की सियासत एकाएक तेज हो गयी है. इस फतवे और अपील को जारी करने वालो में हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्म गुरु शामिल हैं लेकिन सुर्खियाँ मुस्लिम धर्मगुरुओं के हिस्से में ज्यादा आ रही हैं.

मुस्लिम मतदाताओं के बीच भाजपा के खिलाफ खुद को ज्यादा मजबूत दिखाने की यह कोशिश सबसे ज्यादा खुल कर बसपा ने की है . बीते 24 घंटो में बसपा के पक्ष में मौलनों की ताबड़तोड़ अपीलें जारी हुयी है. इनमे सुन्नी वक्फ बोर्ड के सदस्य और सुन्नी मुस्लिमो पर अपना दावा करने वाले दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी से ले कर शिया धर्म गुरु मौलाना कलवे जव्वाद तक शामिल हैं.

इन सबके साथ हिन्दू धर्म गुरु चक्रपाणी महाराज भी बसपा के पक्ष में खुल कर सामने आये हैं. हांलाकि इन धर्मगुरुओं की साख अपने समुदाय में कितनी है इस पर भी सवाल है मगर संदेशो की राजनीति का भी अपना महत्त्व है.
शिया धर्मगुरु मौलाना कालवे जवाद की पकड़ और सम्मान शिया समुदाय में है मगर शिया आबादी कम होने के कारण उनका प्रभाव क्षेत्र यूपी में बहुत ही कम है. लखनऊ और जौनपुर के अलावा किसी और शहर में शिया समुदाय इतनी संख्या में नहीं है कि वोटो का गणित बना या बिगाड़ सके. इसके अलावा कलवे जवाद बीते 5 साल तक शिया वक्फ बोर्ड से ही अपनी लडाई लड़ते रहे. इसलिए उनके अपील को भी उनका खुद का स्वार्थ ज्यादा बताया जा रहा है, समुदाय का कम.

सुन्नी मुस्लिमो के वोटो पर दावा करने वाले दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी की स्थिति भी ऐसी ही है. बीते चुनावो में वे अपने नजदीकी रिश्तेदार को टिकट दिलाने के बावजूद नहीं जिता पाए थे. बाद में अपने दामाद को विधान परिषद् सदस्य बनाने के लिए मुलायम पर दवाव बढ़ने में कामयाब हो गए और राज्य मंत्री का दर्जा भी दिला लिया . मगर उसके बाद अखिलेश यादव ने उनका दबाव मानने से इंकार कर दिया और उनका दर्जा मंत्री पद भी चला गया.

जामा मस्जिद से राजनीतिक घोषणाओं का रिश्ता काफी पुराना हैं. सैयद बुखारी के पिता अब्दुल्ला बुखारी ने 1977 में पहले जनता पार्टी फिर 1980 में कांग्रेस को समर्थन करके इसकी शुरुआत की थी. उस समय बुखारी की बात मुस्लिमो ने सुनी भी , मगर फिर बुखारी की इमेज निजी स्वार्थो के लिए समर्थन देने वालों की बन गयी और उनका प्रभाव ख़त्म होने लगा. जामा मस्जिद दिल्‍ली के जिस मटियामहल विधानसभा क्षेत्र में पड़ती है उसमें इमाम बुखारी के पुरजोर विरोध के बावजूद कांग्रेस के शोएब इकबाल लगातार तीन चुनावों तक जीत दर्ज करते रहे. इसके बाद बुखारी ने यूपी का रुख किया.

हालाकि मुस्लिम मतदाताओं को अपनी और खींचने की कसरत सभी प्रत्याशियों ने शुक्रवार को खूब की और जुमे की नमाज में इबाबतगाहों से अपने हक में वोट करने की अपील कराने के लिए मुस्लिम प्रत्याशियों में होड़ लगी रही. लगभग हर सीट पर प्रत्याशियों के खास लोग उलमाओं और इमाम के घर से लेकर इबादतगाहों में मिलते रहे और कोशिश की कि उनके पक्ष में फरमान सुना दिया जाए मगर इस बार उलेमा ने किसी भी राजनीतिक दल का साथ देने की बंदिश से बचने की कोशिश की.
पहले चरण में 15 जिलों की जिन 71 विधानसभा सीटो पर शनिवार को चुनाव होना है उनमे से अधिकांस पर मुस्लिम मतदाता फैसला करने की स्थिति में है. इस बार सपा कांग्रेस गठबंधन के साथ आम तौर पर मुस्लिमो का रुझान दिख रहा है. हलाकि बसपा ने सबसे ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं. 2013 के दंगो के बाद भाजपा इस इलाके में दृविकरण का लाभ उठाने में कामयाब रही थी. सपा कांग्रेस गठबंधन और बसपा के बीच मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन पाने की होड़ लगी है.

हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कहे जाने वाले चक्रपानी महाराज भी मौके बे मौके अपनी राजनितिक प्रतिबध्हता बदलने के लिए जाने जाते हैं. कभी कांग्रेस कभी समाजवादी पार्टी का समर्थन करते हुए चक्रपानी महाराज इस बार बसपा के पाले में खड़े हो गए हैं. मगर खुद ज्यादातर हिन्दू संगठन उन्हें अपने बीच का नहीं मानते.

चुनावी मौसम में राजनीतिक दलों के नेता ही नहीं बल्कि धर्मगुरु भी पाला और चोला बदलते रहते हैं। दिल्ली की शाही मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी 2012 में जहां एसपी के पक्ष में खड़े थे, वहीं इस बार वह बसपा के पक्ष में मुस्लिमों से वोट करने की अपील कर चुके हैं. शिया आलिम कल्बे जवाद भी बसपा की तरफ नरम रुख अपना रहे हैं. इसके अलावा उलमाओं के कई संगठन भी बसपा को चुनाव में वोट देने की तीन दिन पहले अपील कर चुके हैं.

मौलानाओं की सियासत में दखल पर तंज करते हुए आजम खान ने कभी कहा था – आप इमामत करें और सियासत हमें करने दें. देखना यह है कि निजी वजहों को आवाम का नाम दे कर वोटो को प्रभावित करने वाले इन धर्मगुरुओं की अपील का कितना फायदा बसपा को मिलता है.

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Utkarsh Sinha ( 394 )

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