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अखिलेश अभिमन्यु हैं या अर्जुन? तय करेगा चक्रव्यूह का सातवां द्वार

 Utkarsh Sinha |  2017-03-05 10:49:36.0

अखिलेश अभिमन्यु हैं या अर्जुन? तय करेगा चक्रव्यूह का सातवां द्वार

उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. उत्तर प्रदेश का चुनावी चक्रव्यूह भी महाभारत के चक्रव्यूह की तरह बना हुआ है. वहां भी सात द्वार थे और यहाँ भी सात चरण. यूपी की सियासत में 2 महीने पहले अपनो से लड़ कर सुलतान बने "टीपू" यानी अखिलेश यादव भी उसी प्रकार इस चक्रव्यूह के दरवाजे तोड़ने में लगे हैं जैसे महाभारत में अभिमन्यु लगा था. तब अभिमन्यु सातवां दरवाजा नहीं तोड़ सका था और कौरव महारथियों के हांथो मारा गया. उस दरवाजे को तोड़ने की कला सिर्फ अर्जुन को ही पता थी. यूपी के रण में अखिलेश के निशाने पर भी सातवां दरवाजा है. अब अगर वे इसे तोड़ पाते हैं तो अर्जुन होंगे और नहीं तोड़ पाए तो अभिमन्यु.

यूपी के चुनावो में 7 वा चरण इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण हो गया है क्यूंकि यही पीएम मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी भी है तो मुलायम का आजमगढ़ भी. इसके अलावा गाजीपुर और जौनपुर जैसे सपा के गढ़ भी इसी चरण में अपना फैसला सुनायेंगे.भाजपा की सबसे नजदीकी सहयोगी बनी अनुप्रिया पटेल के रसूख का फैसला भी इसी चरण में होना है.

अभिमन्यु की तरह ही अखिलेश को भी सियासी युद्ध ज्ञान विरासत में ही मिला है. पिता मुलायम सिंह यादव की विरासत में वे कितना युद्ध ज्ञान सीख पाए इसकी भी परीक्षा अखिलेश 2017 में दे रहे हैं. 2012 में पिता और सहोदरों की छत्रछाया में अखिलेश विजयी हुए थे उसके बाद वे अब तक अपनो से ही लड़ रहे हैं. इस बार अखिलेश यादव पूरे चुनावी समर में अकेले हैं. पत्नी डिम्पल यादव को छोड़ कर कोई भी दिग्गज स्टार प्रचारक उनके साथ नहीं दिखाई दे रहा. टीम अखिलेश भी नयी है जिसमे उत्साह तो भरपूर है मगर चुनावी युद्ध कौशल कितना इसका फैसला 11 मार्च को ही होगा.

अखिलेश यादव के नए सखा राहुल गाँधी है. राहुल की राजनितिक समझ और नेतृत्व की स्वीकार्यता होना अभी भी बाकी है. यूपी के चुनावो में हुए सपा कांग्रेस गठबंधन के बाद भी राहुल गाँधी यूपी में टिक कर नहीं रहे. अखिलेश के साथ उन्होंने कुछ रोड शो जरुर किये मगर जिस तरह से अखिलेश ने अकेले लगभग 200 चुनावी सभाए की राहुल की सभाएं उससे बहुत ही कम रही है. दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व के बाद भाजपा जिस तरह संगठित और आक्रामक है उसकी तारीफ करनी होगी. पार्टी के लगभग सभी बड़े नेता, 2 दर्जन केंद्रीय मंत्री और कई प्रदेशो के पार्टी संगठन के लोगों के साथ आरएसएस के कार्यकर्त्ता भी इस बार सूबे में भाजपा सरकार बनाने के लिए जी जान से जुटें हैं.

सूबे के वोटरों का मिजाज भी इस बार कुछ जुदा है. छ चरणों के बीत जाने के बाद भी सियासी फिजा किस और बह रही है इसके सबके अपने अपने दावे हैं. सभी के पास वोटरों के अपने समीकरण है और हर दल दूसरे के बोत बैंक के टूटने की बात कर रहा है. समाजवादी पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक का भरोसा मुलायम सिंह से अलग अखिलेश यादव के साथ किस हद तक कायम है वह भी 11 मार्च को ही पता चलेगा.

समाजवादी पार्टी के लिए प्रचलित तमाम मान्यताओं को अखिलेश यादव ने इस बार किनारे झटक दिया है . मुलायम सिंह यादव ने भले ही बीते महीनो में कई बार बाबरी मस्जिद की याद दिलाई हो मगर अखिलेश ने हमेशा अपने भाषणों में विकास की ही बात की है. नरेन्द्र मोदी द्वारा शमशान और कब्रिस्तान का मामला उठाने के बाद भी अखिलेश ने इसे मजाक से ज्यादा तवज्जो नहीं दी. उग्र हिंदुत्व के ब्रांड एम्बेसेडर योगी आदित्यनाथ के लगातार भाषणों के बाद भी अखिलेश ने उसका जवाब नहीं दिया. योगी पर तंज भी किया तो बिजली के मामले में. यहाँ तक अखिलेश सम्हाले रहे . पूरे अभियान में उन्होंने बस एक बार आप खोया और अमिताभ बच्चन के बहाने गधे वाला बयांन दे दिया, लेकिन इसके फ़ौरन बाद वे सम्हाल गए और फिर से विकास की बातो तक खुद को सिमित कर लिया. अखिलेश यादव के इस रणनीति का ही नतीजा था की यह चुनाव खुल कर वोटो के सांप्रदायिक आधार पर विभाजन से अब तक बचा हुआ है. हालाकि इस मामले में मायावती का खुल कर मुस्लिमो का नाम लेना और 100 मुस्लिमो को टिकट देना योगी सरीखो को मुफीद कर रहा था मगर अखिलेश इससे बचे रहे.

पहले अतीक अहमद और फिर मुख्तार अंसारी सरीखे माफिया छवि वालो को भी अखिलेश ने खुद से दूर रखा. इस सख्ती की वजह से सीटों के संभावित नुकसानों का भी उन्होंने ख्याल नहीं किया मगर पहले भ्रष्टाचार के लिए अखिलेश सरकार के दाग बने और बाद में रेप काण्ड में बुरी तरह फंसे मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति की गिरफ्तारी न होना और मंत्रिमंडल से बर्खास्त न करना अखिलेश यादव के आलोचकों को एक बड़ा मुद्दा दे गया. यहाँ पर अखिलेश का खुद से दागियों को दूर रखने का प्रयास की इमेज पर भी बड़ा सवालिया निशान लगा दिया.

वहीँ दूसरी तरफ भाजपा ने इन चुनावो को ले कर कहीं कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, केशव मौर्या , योगी , अनुप्रिया पटेल सहित तमाम बड़े नेताओं के हेलीकाप्टर लगातार चक्कर लगाते रहे और बिहार भाजपा का पूरा संगठन यूपी में ही पड़ा रहा. आखिरी दौर आते आते तक वाराणसी में केंद्रीय मंत्रिमंडल के दो दर्जन मंत्रियों ने डेरा डाल दिया. बड़े नातों के रोड शो से लेकर मतदान केन्द्रों तक कार्यकर्त्ता तक का प्रबंधन था. हर रैली के पहले सामग्री का पहुँचाना भी स्वचालित तरीके से ही हो रहा था. हालाकि कई जगह भाजपा के बड़े नेताओं पर आचार सहित की धज्जियाँ उड़ने का भी आरोप लगा. भाजपा के झंडे वाले प्रिंट की साड़िया और टी शर्ट भी खूब बंटे और बनारस में तो बिना अनुमति रोड शो करने का आरोप सीधे सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर ही लग गया.

चुनावो में मतदाता ने किस के हक़ में फैसला सुनाया है यह तो आने वाली 11 मार्च की दोपहर को साफ़ हो जायेगा और इसी के साथ यह भी साफ़ हो जायेगा की अखिलेश यादव अर्जुन बने या फिर महारथियों के रचे चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह खेत रहे.

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Utkarsh Sinha ( 394 )

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