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दहकते चिनारों वाले कश्मीर में खतरनाक है राजनीतिक शून्यता

 Tahlka News |  2016-07-12 09:29:18.0

kashmir youth
उत्कर्ष सिन्हा

कश्मीर एक बार फिर सुलग रहा है. घाटी में लगी आग के साथ साथ शेष भारत भी सोशल मीडिया के जरिये इसकी तपिश महसूस कर रहा है. कई सालो की शांति के बाद इस बार घाटी में लगी आग पहले से ज्यादा खतरनाक दिखाई दे रही है.

पाक समर्थित आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की सुरक्षा बालों से हुयी मुठभेड़ में मौत के बाद जो हालात बिगडऩा शुरू हुए वे दिन प्रतिदिन और भी खराब होते जा रहे हैं. हालात इस कदर बिगड़ने लगे हैं कि आमतौर पर शांत रहने वाले इलाकों में भी हिंसा बढ़ गयी है और सरकारी मशीनरी पस्त दिखाई देने लगी है.

इस बार हालत पहले से कुछ जुदा है. 2008 और 2010 में जब जनता सडक़ों पर उतर आई थी और सरकार के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शनों की सिलसिला बहुत वक्त तक जारी रहा था, सुरक्षा बलों को निशाना बनाना तो समय सी बात थी मगर उस वक्त  शिनाख्त कर हमले नहीं होते थे, जो इस बार की हिंसा में आम बात हो चली है. घाटी में दो जगहों पर बीजेपी के दफ्तरों में आग लगा दी गयी और एक विधायक का घर तोडफ़ोड़ का शिकार हुआ. ये कश्मीर में पहली बार हो रहा है.


पहले से ही अलगाववादियों के वर्चस्व वाले अनंतनाग जिले के सीर, कुलगाम और पुलवामा के हुए जबरदस्त प्रदर्शन और हिंसा में कुछ लोगों की जान गयी. एक कोर्ट की बिल्डिंग सहित कई सरकारी इमारतें आग के हवाले कर दी गयीं.

चिंता इस बात से और भी बढ़ रही है कि आखिर सुरक्षा बलों के सामने अब लोग जान की परवाह किये बिना, हथियारबंद सैनिक या पुलिस टुकडिय़ों की नजर के सामने किसी भी प्रतिबंधित जगह में समूह बनाकर घुस जाते हैं. आमने सामने की लडाई ने गृह युद्ध जैसी स्थिति बना दी है.
1948 के बाद कश्मीर बहुत दिनों तक शांत रहा था. सन 1965 में लाल बहादुर शाश्त्री के प्रधानमंत्री रहने के दौरान पकिस्तान ने फिर कश्मीर में जबरदस्त तरीके से घुसपैठ करने की कोशिश की थी, इसके बाद हुए युद्ध में पकिस्तान को पराजय मिली लेकिन जब जनरल जिया ने पकिस्तान की हुकूमत पर कब्ज़ा किया तब उन्हें बखूबी मालुम था कि भारत की सेनाओं से वे सीधे लडाई में नहीं जीत सकते इसलिए जिया ने पाक समर्थित आतंकियों को कश्मीर में उतार दिया.

1978  में पाकिस्तान की हुकूमत पर काबिज होने के साथ ही जिया ने कश्मीर को इस्लाम से जोड़ने की कवायद शुरू कर दी थी और अपने जीवें के आखिरी साल 1988 तक वे कश्मीर को अशांत करने में कामयाब हो चुके थे. घाटी में पहली बात ए.के 47 राईफले गूजने लगी थी जो अमेरिका ने पकिस्तान की फ़ौज को दिया था.

इसके बाद कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का असर साफ नजर आने लगा. इस मामले को तब के भारतीय नेताओं ने भी सम्हालने में बड़ी चूक कर दी. सेना को घाटी में उतारने के बाद पाकिस्तानी समूहों का सफाया तो कश्मीर से हो गया मगर वीपी सिंह की सरकार के गृह मंत्री मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी के 1989 में हुए अपहरण के साथ ही बाजी फिर से पलटने लगी. कई आतंकियों को तब खुद सरकार काबुल तक छोड़ कर आई थी और आतंकी समूहों का मनोबल फिर से बढ़ गया.यही वह समय था जब घाटी से कश्मीरी पंडितो का पलायन शुरू हो गया था.

लेकिन इसके बाद कुछ सुखद घटनाये भी हुयी. यासीन मालिक, शबीर शाह जैसे अलगाववादी नेताओं ने बन्दूक का रास्ता छोड़ दिया. वे स्थानीय कश्मीरी नेता थे जो खुद पाक प्रायोजित समूहों के कश्मीर में सक्रिय होने के खिलाफ थे. यासीन मालिक ने तो सन 2005 में करांची में हुयी एक बड़ी मीटिंग में पकिस्तान को कश्मीर से दूर रहने की चेतावनी भी दे दी थी.

हांलाकि पाकिस्तान से आने वाले विदेशी हमलावरों की कश्मीर में पहुँच बंद तो हो गयी थी मगर कश्मीर अब तक राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय मंचो पर बहस का एक बड़ा मुद्दा बन गया था.

बाद के भारतीय नेताओं ने भी जम्मू-कश्मीर में बहुत सारे ऐसे कदम उठाये जिसके कारण हालात प्रतिदिन बिगड़ते गए. 1947 में जिस कश्मीर में भारत विरोधी सुर नहीं सुनाई देते थे, वहीं आज विरोध के सुर दिन -ब-दिन प्रबल होते जा रहे हैं. 1947 में कश्मीरी अवाम के लिए भारत का मतलब, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला हुआ करते थे , उनको कश्मीरी जनता का हितैषी माना जाता था लेकिन बाद में कश्मीर आवाम का दर्द समझने में राजनेता और सरकारें नाकाम रहीं.

कश्मीर के हालत हो ख़राब करने में भारतीय राजनेताओं ने भी बड़ी भूमिका निभाई. अगर बीते दो दशको को देखे तो कश्मीर में राजनीतिक माहौल में तुरंत लाभ लेने की प्रवृत्ति ने बहुत जोर पकड़ लिया है. नतीजे की परवाह किये बिना हर केंद्र सरकार अपने चापलूस नेताओं को जम्मू-कश्मीर पर थोपती रही है.

मौजूदा केंद्र सरकार ने भी कश्मीर का हितैषी होने के तमाम दावों के बावजूद सत्ता पाने के लिए राजनैतिक समझौते को ही अधिक महत्व दिया है. जिस मुफ्ती मुहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती को आम तौर पर कश्मीर में सक्रिय भारत विरोधी ताकतों का हमदर्द मना जाता रहा है उनके साथ ही हिन्दु राष्ट्रवादी, अनुच्छेद 370 विरोधी पार्टी ने समझौता करके सरकार बना ली तो कश्मीर में विरोध के सभी रास्ते बंद हो गए.
महबूबा मुफ्ती की पार्टी के खिलाफ उनके ही पुराने समर्थक अब खड़े हो गए हैं जो भाजपा से उनके समझौते से नाराज है. दूसरी तरफ जम्मू कश्मीर के भाजपा कार्यकर्त्ता भी अपनी पार्टी से इसलिए नाराज है कि जिस राजनीति के खिलाफ उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया उसी राजनीति के अलंबरदारों के साथ बीजेपी नेताओं ने हाथ मिला लिया है. उमर अब्दुल्ला और कांग्रेस हाशिये पर पड़े हैं नतीजतन राजनीतिक प्रक्रिया की सभी खिड़कियाँ फिलहाल कश्मीर में बंद हो चुकी हैं.

इस राजनैतिक शुन्यता के बीच निराश कश्मीरी आवाम पर चरमपंथी संगठनो ने कब्ज़ा कर लिया है यही चिंता का विषय है. और इस शुन्यता को भापने में केंद्र सरकार और ख़ुफ़िया एजेंसिया बुरी तरह नाकाम रही हैं. कश्मीर घाटी में बीते दिनों कई अवसर आये जब आतंकी घुस पैठ और सुरक्षा बलों पर हमले हुए, पाकिस्तानी झंडे लहराए गए मगर सरकार ने उस पर कोई रणनीतिक कार्यवाही नहीं की. हुर्रियत नेताओं से भी बातचीत के सारे रास्ते बंद कर दिए गए थे, इस लिए माहौल ख़राब होने पर हालत सुधारने के लिए कोई रास्ता ही नहीं दिखाई दे रहा.

बुरहान वानी की शवयात्रा में जुटी आम आवाम की भीड़ भी इस बात के संकेत दे रही है कि सरकारों के खिलाफ उसका गुस्सा भड़क चुका है और सरकार आवाम का भरोसा खो चुकी है.इस बीच शेष भारत में उठा उन्माद कश्मीर को सेना के हवाले कर देने की बाते कर रहा है मगर वह इस बात से अनजान है कि सेना के एक हिस्से द्वारा किए गए अत्याचारों की घटनाओं की वजह से भी कश्मीरी आवाम उसके पूरी तरह खिलाफ है. लम्बे समय से घाटी में मौजूद सेना आम नागरिक को इस बात का एहसास दिलाने में असफल रही है कि वह दरअसल आवाम की सुरक्षा के लिए है. सबसे दुखद यह है कि सेना के जवानों की छवि कश्मीर में प्रताड़ित करने और बलात्कार करने वालो सरीखी बन चुकी है.

इन बदतर होते हालातो को बदलने का महज एक ही रास्ता है कि वहां फिर से राजनीतिक नेतृत्व के इकबाल को बुलंद किया जाय और बीजेपी, कांग्रेस, पीडीपी, नेशनल कान्फ्रेंस जैसी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं की बात को सुनने वाली जमातें नजर आनी शुरू हो जाएँ. फिलहाल तो किसी भी राजनितिक दल के नेता की हैसियत वहां ऐसी नहीं है जो इस आग को ठंडा करने के लिए आगे आ सके.

यही कश्मीर का सबसे बड़ा दुर्भाग्य और भारतीय राजनीती की सबसे बड़ी असफलता है.

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