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निजी शिक्षण व चिकित्सा संस्थानों का सरकारीकरण आम जनता के हित में

 Vikas Tiwari |  2016-09-24 10:28:13.0

निजी शिक्षण

संदीप पाण्डेय

लखनऊ. निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 12 (1)(ग) के तहत कक्षा 1 से 8 तक निःशुल्क शिक्षा हेतु लखनऊ के बेसिक शिक्षा अधिकारी ने शहर के एक बड़े पूंजीपति सुधीर हलवासिया के विद्यालय नवयुग रेडियंस सीनियर सेकेंडरी स्कूल में 21 बच्चों के दाखिला का आदेश किया। विद्यालय ने पाखी राजपूत व आसना फरहद नामक दो बच्चिओं को दाखिला दिया। कानून के विरोध में जाकर आसना फरहद से शुल्क लिया और पाखी राजपूत को शुल्क न दे पाने के कारण विद्यालय से निकाल दिया। आसना फरहद के माता-पिता ने प्रशासन से शिकायत की कि उनकी बच्ची से शुल्क लिया गया है तो आसना फरहद को भी निकाल दिया गया। आसना के माता-पिता जब नवयुग रेडियंस पहुंचे तो उन्हें सुधीर हलवासिया से मिलने के लिए कहा गया। जो विजिटिंग कार्ड उन्हें दिया गया उसमें सुधीर हलवासिया को सदस्य, राज्य कार्यकारिणी, भाजपा बताया गया है। शेष बच्चों को तो अभी सुधीर हलवासिया ने दाखिला ही नहीं दिया है। क्या सुधीर हलवासिया देश के कानून से ऊपर हैं?

 
      एक तरफ विदेश मंत्री सुषमा स्वाराज एक पाकिस्तान से आई लड़की मधु के दिल्ली में दाखिले के लिए सारे नियम-कानून ताक पर रख देती हैं और दिल्ली सरकार से कह कर उसका दाखिला एक विद्यालय में करवा देती हैं। किसी बच्ची को पढ़ने का अवसर मिले इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा सरकार का यह कदम पाकिस्तान को नीचा दिखने के लिए ज्यादा  था कि जिनके साथ पकिस्तान में भेदभाव होता है उसे भारत गले लगाएगा। दूसरी तरफ अपने ही देश के नागरिकों की लड़कियों को पढ़ाने में सुधीर हलवासिया को परेशानी होती है। यह सरकार का दोगलापन है। वह अपने बच्चों के प्रति संवेदनहीन है। ऐसा नहीं होता तो सुधीर हलवासिया की हिम्मत नहीं होती कि वह उन बच्चों को, जिनका दाखिला एक विशेष कानून के तहत हुआ है, इतनी बेरहमी से निकाल देते। क्या भारत में रहने वाले असंख्य बच्चों को मधु की तरह विद्यालयों में दाखिले का अधिकार नहीं?
 
यह भी सोचनीय विषय है कि प्रधान मंत्री के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ नारे का क्या होगा ? इत्तेफाक से सुधीर हलवासिया द्वारा निकाले गए दोनों बच्चे लड़कियां हैं। अटल बिहारी वाजपेयी ने भी ’आओ स्कूल चलें’ अभियान से बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया। इसका मतलब भाजपा दिखावा ज्यादा करती है और उसकी नीयत साफ नहीं है। बच्चों की पढ़ाई उसके लिए कोई प्राथमिकता नहीं।
 
कांग्रेस जो यह कानून 2009 में लाई थी के एक बड़े नेता अभिषेक मनु सिंघवी निजी विद्यालयों के एक संगठन जो सर्वोच्च न्यायालय में शिक्षा के अधिकार अधिनियम के खिलाफ मुकदमा कर चुका है के वकील हैं। अभिषेक मनु सिंघवी एक बड़े वकील हैं। वे पैसा अन्य मामलों में भी कमा सकते थे। क्या यह नैतिक रूप से सही है कि गरीब बच्चों के पढ़ने के अधिकार के खिलाफ वे न्यायालय में खड़े हों?
 
अभिषेक मनु सिंघवी की ही तरह शांति भूषण, जो जनता पार्टी की सरकार में विधि मंत्री रह चुके हैं व अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष के महत्वपूर्ण स्तंभ थे, 2015 में जब लखनऊ का सिटी मांटेसरी विद्यालय 31 बच्चों, जिनके दाखिले का आदेश बेसिक शिक्षा अधिकारी ने दिया था, का विरोध कर रहा था तो विद्यालय की तरह से न्यायालय में खड़े हुए। क्या एक सामाजिक छवि वाले वकील के लिए यह उचित है कि वह गरीब बच्चों के पढ़ने के अधिकार के खिलाफ न्यायालय में खड़ा हो? शांति भूषण के पास भी कोई पैसे की कमी नहीं।
 
उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव शिक्षा के अधिकार अधिनियम की धारा 12 (1)(ग) के तहत बच्चों को दाखिला दिलाए जाने को अपनी उपलब्धियों में गिनते हैं। 2015 में सिटी मांटेसरी के खिलाफ चार माह न्यायालय में मुकदमा लड़ने के बाद अंततः 13 बच्चों का दाखिला उच्च न्यायालय के आदेश और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसमें हस्तक्षेप से मना करने पर सम्भव हुआ। अखिलेश यादव ने तो उल्टा 2014 में जगदीश गांधी, जो विद्यालय के संस्थापक हैं, को यश भारती पुरस्कार, जिसमें रु. 11 लाख नकद के साथ रु. 50,000 प्रति माह पेंशन भी मिलने का प्रावधान है, देने के बाद 2016 में, जबकि वे गरीब बच्चों के दाखिले का जमकर विरोध चुके थे, उनकी पत्नी भारती गांधी को रानी लक्ष्मी बाई वीरता पुरस्कार से अलंकृत किया है। भारती गांधी की वीरता शायद इसे में रही कि उन्होंने शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत दाखिले दिए गए 23 वाल्मीकि व 8 मुस्लिम, जिसमें 6 अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं, बच्चों के दाखिले का निर्लज्जता से विरोध किया।
 
      इस वर्ष भी जगदीश गांधी 53 बच्चों के दाखिले का विरोध कर रहे हैं। वे बच्चों की जांच करा रहे हैं कि वे दाखिले हेतु सारे मानक पूरे कर रहे हैं अथवा नहीं। सोचने का विषय है कि जब बेसिक शिक्षा अधिकरी ने जांच-पड़ताल करा दाखिले का आदेश किया है तो जगदीश गांधी को क्या अधिकार है कि वे अपनी जांच कराएं? वे कह रहे हैं कि वे बच्चों की पात्रता की पड़ताल कर रहे हैं। क्या यह सबको मालूम नहीं कि जगदीश गांधी प्रभावशाली लोगों के बच्चों को शुल्क में छूट देते हैं? जब वे पैसे वालों के बच्चों को मुफ्त पढ़ा सकते हैं तो क्या गरीबों के बच्चों को नहीं?
 
      जगदीश गांधी की दो में से एक लड़की का नाम है सुनीता गांधी है जिसने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से शिक्षा में पी.एच.डी. की हुई है। उसने अपना एक दूसरा विद्यालय जिसका नाम सिटी इण्टरनेशनल स्कूल है शुरू किया है। वह भी, बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा दाखिले हेतु जिन 9 बच्चों की संस्तुति की गई है, को दाखिला नहीं दे रही हैं। लखनऊ में सारे बच्चे साक्षर हों इसके लिए वे अनौपचारिक कार्यक्रम चला रही हैं लेकिन गरीब बच्चे मुख्य धारा में अमीर बच्चों के साथ पढ़े इसके लिए वे तैयार नहीं।
 
      इस तरह हम देखते हैं कि चाहे बड़े राजनीतिक दल हों अथवा पूंजीपति वर्ग वह नहीं चाहते कि गरीबों के बच्चों को शिक्षा के अधिकार तहत अच्छी शिक्षा मिले।
 
      सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) की यह मांग है कि देश में समान शिक्षा प्रणाली लागू की जाए ताकि सभी बच्चों को एक जैसी शिक्षा मिले व शिक्षा व चिकित्सा के क्षे़त्रों से निजीकरण तुरंत समाप्त कर सभी निजी शिक्षण व चिकित्सीय संस्थानों का राष्ट्रीयकरण या सरकारीकरण कर लिया जाए।
 

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