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सियासत के मजबूत पहलवान की पराजय से एक युग का अवसान

 Girish |  2017-01-01 08:18:01.0

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उत्कर्ष सिन्हा
लखनऊ. करीब तीन साल पहले यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ व्यक्तिगत बातचीत में वो इस बात से बहुत परेशान लग रहे थे कि मुख्यमंत्री होने के बाद भी उनकी कई मामलों में नहीं चल पा रही. तब मैंने उनसे पूछा था, जोधा- अख़बर फिल्म देखि है ? उन्होंने कहा क्यों पूछ रहे हैं ? मैंने कहा था- इस फिल्म में एक सबक है, जबतक बैरम खान हज पर नहीं गया, जलालुद्दीन अकबर नहीं बन सका था.


साल 2017 की पहली सुबह इस युग के बैरम खान को हज पर भेजने की घोषणा भी लखनऊ के जनेश्वर मिश्र पार्क से हो गयी. अब सवाल ये है की क्या जललुद्दीन अख़बर बन पायेगा.


जिस बात की उम्मीद शनिवार को ही लगायी जा रही थी। वही, रविवार की सुबह हुआ। नए साल की पहली सुबह ने भारतीय राजनीति के सबसे बड़े और चतुर पहलवान मुलायम सिंह के सारे दांव बेकार गए और उनके ही अपनों ने उन्हें सियासत के अखाड़े में ,एेेतिहसिक पटखनी दे डाली।


शनिवार की दोपहर बाद जब यह माना जा रहा था की सब कुछ ठीक हो गया है तब भी अखिलेश और रामगोपाल को इस बात की शंका थी की मुलायम सिंह खेमा कभी भी अपना चरखा दांव अाजमा सकता है। इसीलिए रविवार को बुलाये गए सम्मलेन को करने की सूचना लगातार मुख्यमंत्री खेमे से एलान होते रहे।


आशंका सच हुयी और रविवार की सुबह मुलायम सिंह ने इस सम्मलेन को ख़ारिज करने की चिट्ठी जारी कर दी. साथ ही शिवपाल यादव ने कई जिलाध्यक्षो को पार्टी से निकल दिया। मगर तब तक लखनऊ का जनेश्वर मिश्र पार्क में लगभग पूरी समाजवादी पार्टी खड़ी थी और मुलायम अपनी ही बनायीं गई समाजवादी पार्टी में अकेले पड़ गए।


मुलायम सिंह ने कभी यह सोचा नहीं होगा की चौधरी चरण सिंह, वी पी सिंह और चंद्रशेखर जैसे नेताओं के साथ जो उन्होंने किया था। वही कभी उनके साथ उनका ही बेटा करेगा. मगर इतिहास खुद को दोहराता है और साथ ही नया इतिहास भी लिखा जाता है. 1 जनवरी 2017 को भी भारतीय राजनीती के इतिहास में वही जगह मिल गयी है जिसे सियासी पंडित कभी नहीं भूल पायेंगे.


शनिवार को अखिलेश यादव ने विधानमंडल दल पर अपनी पकड़ दिखाई थी और रविवार को पूरी पार्टी पर उनकी पकड़ साबित हो गयी. कभी मुलायम की राजनीति में आधार धुरी बने रहने वाले शिवपाल सिंह यादव ही मुलायम के राजनीतिक अवसान का कारण भी बन गए. अब समाजवादी पार्टी में मुलायम उसी दशा में पंहुच गए हैं जिस हालत में भारतीय जनता पार्टी में लाल कृष्ण आडवानी.


सियासत की नब्ज को बखूबी समझने वाले मुलायम पहली बार अपनी ही पार्टी में बहती हवा का अंदाजा लगाने में चूक गए. उन्होंने सोचा था की जैसे हर बार अंट में उनकी बात ही मानी जाती रही वही इस बार भी होगा और वो सरपंच साबित होंगे मगर इस बार पंचायत ने उन्हें सरपंच मानाने से ही इनकार कर दिया.


मुलायम को सबसे करीब से समझने वालो में से एक पर. रामगोपाल यादव यह बखूबी समझ रहे थे कि मुलायम की बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इसके साथ ही अमर सिंह किसी को बर्दाश्त नहीं थे. नतीजतन इस पूरी लडाई का मोहरा बने शिवपाल यादव ने अपना सबकुछ खो दिया.


अब अखिलेश नयी भूमिका में हैं मगर इसके साथ ही उनकी चुनौतिया भी बढ़ गयी है. अप तक गलतियों का ठीकरा दूसरो के सर फूट जाता था मगर अब अखिलेश के हर काम की जिम्मेदारी भी उन्ही के सर होगी.


बहरहाल सल्तनत की लडाई हमेशा इसी तरह होती थी और इस बार भी बैरम खान को जब हज के लिए भेज दिया गया है तब जलालुद्दीन के अकबर बनने की प्रक्रिया भी मुकम्मल हो चुकी है. साबित अब अखिलेश को करना है.

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Girish ( 4001 )

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