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पहलवान से विधायक बने मुलायम बेटे से खाई पटखनी

 Girish |  2017-01-01 08:07:12.0

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तहलका न्‍यूज ब्‍यूरो
लखनऊ:
मुलायम सिंह पुराने पहलवान हैं। अखाड़े की कुश्ती में माहिर। राजनीति की कुश्ती में उनके 'चरखा दांव' से बड़े-बड़े खुर्राट राजनेता भी कई बार पटखनी खा चुके हैं। अपने राज‍नीतिक जीवन में अब तक मुलायम बस एक ही बार दांव चूके हैं, जब वह राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गये थे। कहा जाता है कि तब एक और यादव नेता और अब उनके समधी लालू प्रसाद ने ऐन मौके पर औचक लंगड़ी मार दी थी।





लेकिन आज मुलायम सिंह को दूसरी बार चुनौती बेटे से मिली है। वैसे समाजवादी पार्टी में तीन महीने से चल रही कुश्ती के हर राउंड में अब तक तो मुलायम सिंह यादव ही जीतते दिखाई दिये, लेकिन आज उनके ही बेटे अखिलेश यादव ने दांव लगाते हुए उन्‍हें सपा सुप्रीमो के पद से हटाते हुए पार्टी से सरंक्षक बना दिया और खुद सपा का अध्‍यक्ष बन गए।


उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव की पार्टी को 25 साल हो गए। सियासत की दुनिया में नेताजी के तौर पर मशहूर मुलायम ने अपने राजनीतिक करियर में तमाम उतार-चढ़ाव देखे हैं। 22 नवंबर 1939 को इटावा जिले के सैफई में जन्मे मुलायम सिंह की पढ़ाई-लिखाई इटावा, फतेहाबाद और आगरा में हुई। मुलायम कुछ दिनों तक मैनपुरी के करहल स्थ‍ित जैन इंटर कॉलेज में प्राध्यापक भी रहे। पांच भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर मुलायम सिंह थे।


टीचर से विधायक बने पहलवान मुलायम
पिता सुधर सिंह मुलायम को पहलवान बनाना चाहते थे, लेकिन पहलवानी में अपने राजनीतिक गुरु नत्थूसिंह को मैनपुरी में आयोजित एक कुश्ती-प्रतियोगिता में प्रभावित करने के बाद उन्होंने नत्थूसिंह के परंपरागत विधान सभा क्षेत्र जसवंतनगर से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया। राम मनोहर लोहिया और राज नरायण जैसे समाजवादी विचारधारा के नेताओं की छत्रछाया में राजनीति का ककहरा सीखने वाले मुलायम 28 साल की उम्र में पहली बार विधायक बने, जबकि उनके परिवार का कोई सियासी बैकग्राउंड नहीं था।


ऐसे में मुलायम के सियासी सफर में 1967 का साल ऐतिहासिक रहा जब वो पहली बार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। यह और बात है कि उस वक्त समाजवादी पार्टी का नामोनिशान तक नहीं था। मुलायम संघट सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर अपने गृह जनपद इटावा की जसवंतनगर सीट से आरपीआई के उम्मीदवार को हराकर विजयी हुए थे। मुलायम को पहली बार मंत्री बनने के लिए 1977 तक इंतजार करना पड़ा। उस वक्त कांग्रेस विरोधी लहर में उत्तर प्रदेश में भी जनता सरकार बनी थी।


50 साल की उम्र में पहली बार बने सीएम
मुलायम सिंह यादव 1980 के आखिर में उत्तर प्रदेश में लोक दल के अध्यक्ष बने थे जो बाद में जनता दल का हिस्सा बन गया. मुलायम 1989 में पहली बार उत्तर प्रदेश के सीएम बने। नवंबर 1990 में केंद्र में वीपी सिंह की सरकार गिर गई तो मुलायम सिंह चंद्रशेखर की जनता दल (समाजवादी) में शामिल हो गए। और कांग्रेस के समर्थन से सीएम की कुर्सी पर विराजमान रहे। अप्रैल 1991 में कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया तो मुलायम सिंह की सरकार गिर गई। 1991 में यूपी में मध्यावधि चुनाव हुए जिसमें मुलायम सिंह की पार्टी हार गई और बीजेपी सूबे में सत्ता में आई।


मुलायम ने इंस्पेक्टर को मंच पर पटक दिया था
राजनीति में दांव पेंच से पहले मुलायम ने कुश्ती में दांव आजमाए थे। 1960 में मैनपुरी के करहल के जैन इंटर कॉलेज में एक कवि सम्मेलन चल रहा था। उस समय के मशहूर कवि दामोदर स्वरूप विद्रोही ने अपनी लिखी एक कविता सुनानी शुरू की। कविता थी दिल्ली की गद्दी सावधान। तभी एक पुलिस इंस्पेक्टर ने उनसे माइक छीनकर कहा कि सरकार के खिलाफ कविताएं मत पढ़ो। उस वक्त एक लड़का दर्शकों में से निकल कर आया। बड़ी फुर्ती से मंच पर चढ़ा और इंस्पेक्टर को उठाकर मंच पर ही पटक दिया। इस लड़के का नाम था मुलायम सिंह। बरसों बाद मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने तो दामोदर को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान दिया।


1992 में नेताजी ने बनाई अपनी पार्टी
चार अक्टूबर, 1992 को लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाने की घोषणा की। समाजवादी पार्टी की कहानी मुलायम सिंह के सियासी सफर के साथ-साथ चलती रही। मुलायम सिंह यादव ने जब अपनी पार्टी खड़ी की तो उनके पास बड़ा जनाधार नहीं था। नवंबर 1993 में यूपी में विधानसभा के चुनाव होने थे. सपा मुखिया ने बीजेपी को दोबारा सत्ता में आने से रोकने के लिए बहुजन समाज पार्टी से गठजोड़ कर लिया. समाजवादी पार्टी का यह अपना पहला बड़ा प्रयोग था। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पैदा हुए सियासी माहौल में मुलायम का यह प्रयोग सफल भी रहा। कांग्रेस और जनता दल के समर्थन से मुलायम सिंह फिर सत्ता में आए और सीएम बने।


जब पीएम बनते-बनते रह गए थे नेताजी
समाजवादी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के इरादे से मुलायम ने केंद्र की राजनीति का रुख किया। 1996 में मुलायम सिंह यादव 11वीं लोकसभा के लिए मैनपुरी सीट से चुने गए. उस समय केंद्र में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी तो उसमें मुलायम भी शामिल थे. मुलायम देश के रक्षामंत्री बने थे।


हालांकि, यह सरकार बहुत लंबे समय तक चली नहीं। मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री बनाने की भी बात चली थी। प्रधानमंत्री पद की दौड़ में वे सबसे आगे खड़े थे, लेकिन लालू प्रसाद यादव और शरद यादव ने उनके इस इरादे पर पानी फेर दिया। इसके बाद चुनाव हुए तो मुलायम सिंह संभल से लोकसभा में वापस लौटे। असल में वे कन्नौज भी जीते थे, लेकिन वहां से उन्होंने अपने बेटे अखिलेश यादव को सांसद बनाया।


2012 में बेटे को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाया
2003 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को जीत नसीब हुई। 29 अगस्त 2003 को मुलायम सिंह यादव एक बार फिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। यह सरकार चार साल ही रह पाई। 2007 में विधानसभा चुनाव हुए मुलायम सिंह सत्ता से बाहर हो गए। 2009 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की हालत खराब हुई तो मुलायम सिंह ने बड़ा फैसला लिया। राज्य विधानसभा में नेता विपक्ष की कुर्सी पर छोटे भाई शिवपाल यादव को बिठा दिया और खुद दिल्ली की सियासत की कमान संभाल ली। 2012 के चुनाव से पहले नेताजी ने अपने बेटे अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश सपा की कमान सौंपी। 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा के पक्ष में अप्रत्याशित नतीजे आए। नेताजी ने बेटे अखि‍लेश को सूबे के सीएम की कुर्सी सौंप दी और समाजवादी पार्टी में दूसरी पीढ़ी ने दस्तक दी।


यादव परिवार के 20 सदस्य समाजवादी पार्टी का हिस्सा
मुलायम सिंह यादव का परिवार देश का सबसे बड़ा सियासी परिवार है। आज की तारीख में इस परिवार के 20 सदस्य समाजवादी पार्टी का हिस्सा हैं। यह पार्टी उसी लोहियाजी के आदर्शों पर चलने का दावा करती है जो नेहरू की परिवारवाद की राजनीति को बढ़ावा देने की आलोचना करते थे। मुलायम सिंह की जिंदगी में कुछ ऐसे पल भी आए जिनसे वो खुद और उनका कुनबा विवादों में रहे।


रामपुर तिराहा कांड
वो 1990 के दशक के शुरुआती साल थे जब उत्तराखंड की मांग जोर पकड़ रही थी. 2 अक्टूबर 1994 को अलग उत्तराखंड की मांग को लेकर लोग दिल्ली रैली में शिरकत करने जा रहे थे। उत्तर प्रदेश में उस वक्त मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। बताया जाता है कि सीएम मुलायम के आदेश पर इन लोगों को मुजफ्फरनगर के पास रामपुर तिराहे पर घेर लिया गया। इस दौरान पुलिस ने आंदोलनकारियों पर न सिर्फ लाठी-डंडे बरसाए बल्कि फायरिंग भी हुई. इस घटना को रामपुर तिराहा गोलीबारी कांड के नाम से जाना जाता है। इस घटना में 6 लोग मारे गए. कुछ महिलाओं के साथ छेड़खानी और दुष्कर्म के आरोप भी लगे थे। इस घटना के बाद पूरे प्रदेश में मातम और अफरातफरी का माहौल फैल गया।


इस घटना के बाद मुलायम सिंह यादव की इमेज एक 'विलेन' जैसी हो गई थी। देहरादून समेत तमाम जगहों पर मुलायम सिंह के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे। 22 साल बाद भी इस घटना के दोषि‍यों को सजा नहीं मिली है। कोर्ट अगर दोषि‍यों को बरी भी कर देती है तो उत्तराखंड की जनता मुलायम सिंह को शायद ही माफ करे।


गेस्ट हाउस कांड
2 जून 1995 को लखनऊ में हुआ स्टेट गेस्ट हाउस कांड मुलायम सिंह के सियासी करियर पर सबसे बड़ा दाग है। उस वक्त बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती से साथ हुए दुर्व्यवहार की वजह से मुलायम अगले दिन ही सत्ता से बेदखल हो गए। इस घटना से समाजवादी पार्टी की साख पर भी इससे बड़ा बट्टा लगा।


दरअसल, 1993 के यूपी चुनाव में बसपा और सपा में गठबंधन हुआ था, जिसकी बाद में जीत हुई। मुलायम सिंह यूपी के सीएम बने. लेकिन, आपसी खींचतान के चलते 2 जून, 1995 को बसपा ने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। इससे मुलायम सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई थी। नाराज सपा के कार्यकर्ताओं ने लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाउस पहुंच कर मायावती को घेर लिया. यहां मायावती कमरा नंबर-1 में रुकी हुईं थीं. उनके साथ बसपा के एमएलए और कार्यकर्ता भी मौजूद थे। इस दौरान सपा कार्यकर्ताओं ने उन्हें मारपीट कर बंधक बना लिया। मायावती ने अपने आप को बचाने के लिए कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया था।


करीब 9 घंटे बंधक बने रहने के बाद बीजेपी नेता लालजी टंडन ने अपने समर्थकों से साथ वहां पहुंचकर मायावती को वहां से सुरक्षित निकाला. इसी घटना के बाद से मायावती, लालजी टंडन को अपना भाई मानने लगीं।


आय से अधिक संपत्त‍ि का मामला
मुलायम सिंह यादव और उनका परिवार पर आय से अधिक संपत्त‍ि के मामले अदालतों में चले. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया कि 1977 में जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में पहली बार मंत्री बने थे, तब से लेकर 2005 तक उनकी संपत्ति करीब 100 गुना ज्यादा बढ़ गई थी. ऐसे में इस बात की जांच होनी चाहिए कि आखिर इतनी संपत्ति उन्होंने और उनके परिवार ने कैसे अर्जित कर ली.


शुरू में इस मामले में तो मुलायम सिंह के साथ उनके बेटे अखिलेश यादव, बहू डिंपल यादव, दूसरे बेटे प्रतीक यादव भी आरोपी थे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने डिंपल यादव को जांच के दायरे से ये कहते हुए बाहर कर दिया था कि वो उस समय सार्वजानिक पद पर नहीं थीं. शीर्ष अदालत ने इस मामले में सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका भी खारिज कर दी है.


यादव परिवार में 'महाभारत'
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मुलायम सिंह के कुनबे में जमकर घमासान हुआ. हालांकि विरोधी पार्टियों ने इसे यादव परिवार की सोची समझी रणनीति के तहत तैयार किया गया 'ड्रामा' करार दिया है. इस कलह की सुगबुगाहट उस वक्त ही शुरू हो गई थी जब मुलायम के साथी रहे अमर सिंह की समाजवादी पार्टी में घर वापसी का अखिलेश ने विरोध किया. चाचा शिवपाल और अमर सिंह के समर्थन से बाहुबली मुख्तार अंसारी की पार्टी के समाजवादी पार्टी में हो रहे विलय का अखिलेश ने विरोध किया. लेकिन नेताजी के आगे अखिलेश की नहीं चली.


बाद में अखिलेश यादव ने भ्रष्टाचार के आरोपी कुछ मंत्रियों को अपनी कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखा दिया. अखिलेश ने अपनी कैबिनेट में अहम मंत्रालयों का जिम्मा संभाल रहे चाचा शिवपाल यादव की भी कैबिनेट से छुट्टी कर दी. मुलायम सिंह ने बैलेंस करने की कोशि‍श में प्रदेश अध्यक्ष का पद बेटे से छीनकर भाई को सौंप दिया. हालांकि बाद में शि‍वपाल की कैबिनेट में भी वापसी हो गई और कलह का यह दौर शांत हुआ. लेकिन अखि‍लेश को प्रदेश अध्यक्ष का पद वापस नहीं मिल पाया. फिर अखिलेश ने चाचा शिवपाल समेत कुछ मंत्रियों की अपने कैबिनेट से छुट्टी कर दी. अब कलह का एक और दौर यादव परिवार में शुरू हुआ. मुलायम के चचेरे भाई और राज्यसभा सदस्य रामगोपाल यादव पार्टी से निकाल दिए गए. अखि‍लेश के कुछ और करीबियों की भी पार्टी से छुट्टी कर दी गई.


समाजवादी पार्टी में चल रहे सियासी कलह को खत्‍म करने के लिए आजम खान की मध्यस्थता में अखिलेश, मुलायम और शिवपाल की बैठक के बाद शनिवार को एक नया मोड़ आ गया। रामगोपाल यादव और अखिलेश यादव का निष्कासन रद्द कर दिया गया, जिसका ऐलान सपा प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने किया। इसके तुरंत बाद शिवपाल सिंह यादव ने एक ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने कहा कि सभी मिल कर सांप्रदायिक ताकतों से लड़ेंगे।

बैठक के बाद शिवपाल सिंह यादव ने मीडिया से बात करते हुए कहा, सब लोग मिलकर चुनाव में जाएंगे और समाजवादी पार्टी को दोबारा सत्ता में लाएंगे। उन्होंने कहा, मुलायम और अखिलेश साथ में बैठकर प्रत्याशियों के नामों पर विचार करेंगे. अखिलेश की सूची स्वीकार कर ली जाएगी और सभी प्रत्याशियों पर एक बार फिर विचार किया जाएगा।

वहीं, सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने चिट्ठी जारी करके अधिवेशन को असंवैधानिक बताया है. इसके अलावा चेतावनी देते हुए कहा है कि जो भी अधिवेशन में जाएगा, उस पर कार्रवाई की जाएगी.


सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के कहने के बाद भी इमरजेंसी अधिवेशन को रद्द नहीं किया गया है। यह अधिवेशन आज जनेश्वर पार्क में आयोजित किया जा रहा है। बता दें कि अखिलेश खेमे के नेता रामगोपाल यादव की बुलाई इस बैठक को ही पार्टी में झगड़े की नई जड़ माना जा रहा था, जिसकी वजह से मुलायम सिंह ने सीएम अखिलेश और रामगोपाल को पार्टी के छह साल के निष्कासित कर दिया था।


आजम खान की मौजूदगी में हुए समझौता बैठक में अखिलेश यादव ने शर्त रखी कि शुक्रवार को किए गए सारे निलंबन रद्द किए जाएं। मुलायम सिंह यादव ने इसे मानते हुए बेटे अखिलेश यादव और भाई रामगोपाल यादव का निलंबन रद्द कर दिया. अखिलेश यादव ने कहा कि चुनाव से पहले पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करे, जिसे अभी तक नहीं माना गया है.


अखिलेश यादव ने मांग की कि शिवपाल यादव को यूपी में सपा के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया जाए. इस बात को भी मुलायम सिंह यादव ने अभी तक नहीं माना है.अखिलेश यादव ने मांग की कि टिकट बांटने का अधिकार मिले, लेकिन अभी तक इस पर भी मुलायम सिंह यादव ने हामी नहीं भरी है.अमर सिंह को पार्टी से बाहर किया जाए। इस मांग पर भी अंतिम फैसला नहीं लिया गया है.

मुलायम ने कहीं ये 7 बड़ी बातें...


1. रामगोपाल यादव और मुख्यमंत्री (अखिलेश यादव) को 6 साल के लिए पार्टी से निष्काषित किया जा रहा है। मैंने अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनाया। इतिहास में ऐसा किसी ने नहीं किया था। मेरी सेहत ठीक थी फिर भी उसे मुख्यमंत्री बनाया था।


2. मैंने उसे (अखिलेश यादव) सीएम इसलिए बनाया क्योंकि फिर वह कभी नहीं बन पाता। लेकिन अखिलेश ने पार्टी को कमजोर किया।


3. अखिलेश का भविष्य रामगोपाल ने खत्म किया। उसी ने अखिलेश को भड़काया है। रामगोपाल अखिलेश को बहका रहे हैं और उनका भविष्य खराब कर रहे हैं। अखिलेश इस बात को नहीं समझते हैं। क्या इन सब से उनका (अखिलेश) का भविष्य खराब नहीं होगा?


4. मुलायम ने स्पष्ट कहा- मैं फैसला करूंगा कि मुख्यमंत्री कौन होगा।


5. आज यह पार्टी जिस स्थिति में है, उसके लिए मैंने बहुत मेहनत की है। इसमें उनका (अखिलेश-रामगोपाल) क्या योगदान रहा? मेहनत मैंने की है और फल वे खा रहे हैं। अखिलेश को समझना चाहिए था।


6. मैंने जीतने वाले उम्मीदवार खड़े किए थे ताकि वह (अखिलेश) फिर से सीएम बन सके। हमारी प्राथमिकता पार्टी को बचाना है।


7. अखिलेश मुझसे माफी क्यों मांगेगा? नहीं पता वह पिता मानता भी है या नहीं। अखिलेश ने अपना भविष्य ख़ुद ख़राब कर लिया। उसे समझना चाहिए था।


बताते चले कि दें कि मुलायम ने शुक्रवार देर शाम आनन-फानन में पहले तो बेटे और फिर भाई को कारण बताओ नोटिस जारी किया और इसके दो घंटे बाद ही पार्टी से यह कह कर निकाल दिया कि अनुशासनहीनता नहीं चलने दी जाएगी और वे पार्टी को टूटने नहीं देंगे। मुलायम सिंह यादव ने सपा दफ्तर में हुई प्रेस कांफ्रेंस में शाम को कहा कि जो भी एक जनवरी के अधिवेशन में हिस्सा लेगा, उसे पार्टी से निकाला दिया जाएगा। प्रत्याशियों की सूची तय करने का अधिकार केवल पार्टी अध्यक्ष को है। कोई दूसरा इस तरह प्रत्याशी तय नहीं कर सकता। हालांकि रामगोपाल ने मुलायम के इस कदम को असंवैधानिक करार दिया है।

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