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पाकिस्तानी आतंकियों की मदद करते हैं भारत के कुछ पत्रकार

 Sabahat Vijeta |  2016-09-29 14:12:25.0

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शबाहत हुसैन विजेता


लखनऊ. भारतीय कमांडोज़ लाइन ऑफ़ कंट्रोल पार कर आतंकियों के ठिकानों को नष्ट कर लौट आये हैं तो देश में जश्न का माहौल है. देश आज दलगत राजनीति से बहुत ऊपर है. भारतीय सेना की शान में क़सीदे पढ़े जा रहे हैं. हर चैनल पर सिर्फ यही ख़बर है. हर ज़बान पर बस यही ज़िक्र है. सर्जिकल स्ट्राइक के मुद्दे पर जो देश हमारे साथ खड़े हैं उनकी भी चर्चाएँ चल रही हैं. सोशल मीडिया भी इस मुद्दे पर रंगा पड़ा है. कुछ लोग इसे दीवाली से पहले दीवाली मान रहे हैं तो कुछ को लगता है कि यह तो सिर्फ नाश्ता है. लंच और डिनर अभी बाकी है. ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने शहीद भारतीय सैनिकों के दसवें पर इसे सेना की तरफ से श्रधांजलि बताया है मगर भारतीय सेना की इस कार्यवाही के बाद पकिस्तान की तरफ से किस तरह की हरकत हो सकती है इस पर अभी सोचने का काम शुरू नहीं किया गया है. जो हो जाना चाहिए था.


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पकिस्तान की बुनियाद भारत विरोध पर ही टिकी है. पकिस्तान ने आईएसआई को बस यही काम सौंप रखा है कि भारत के खिलाफ साजिशें रचो और उसे अपनी गोद में बिठाकर पाले गए आतंकियों से अमल में लाओ. दिखावे के लिये उसने इंदिरा गांधी से लेकर नरेन्द्र मोदी तक बार-बार उच्च स्तरीय बैठकें कीं लेकिन हकीकत में हुआ कुछ नहीं.


उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग से वरिष्ठ पद से रिटायर होने वाले अशोक कुमार शर्मा ने पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेन्सी आईएसआई पर काफी अध्ययन किया है. आईएसआई की गतिविधियों पर उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी थी. इस पुस्तक को भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने अपने सर्वोच्च सम्मान पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त पुरस्कार से सम्मानित भी किया था. अशोक शर्मा को तकलीफ इसी बात की है कि भारत सरकार ने मुझे पुरस्कृत तो किया लेकिन उस किताब को नहीं पढ़ा. उनका कहना है कि अगर उनकी किताब को पढ़ा गया होता तो कारगिल की जंग को रोका जा सकता था.


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इस पुस्तक में श्री शर्मा ने तभी लिखा था कि पाकिस्तानी फौज की योजना कारगिल पर कब्ज़े की है. ऑपरेशन टोपाक के तहत भारत में आईएसआई की कार्रवाईयां चलती हैं. आईएसआई के स्लीपिंग मॉड्यूल के कई सदस्य पत्रकार भी हैं. वह सोशल मीडिया में भी सक्रिय हैं. वह दूकानदार हैं, फेरीवाले हैं, जेबकतरे हैं, दुर्दांद अपराधी भी हैं, वह निर्देश मिलने पर कार्रवाईयां करते हैं. भारत में आतंकियों की मदद करते हैं. ये स्लीपिंग मोड्यूल कभी खुलकर काम नहीं करते. एक दूसरे को समय-समय पर बदले जानेवाले कोड वाक्यों या की-नम्बरों से पहचानते हैं, इनकी आपसी बातचीत में विशेष शब्दावली का इस्तेमाल होता है. वह निर्देश मिलने पर कार्रवाईयां करते हैं. भारत में आतंकियों की मदद करते हैं.


सर्जिकल स्ट्राइक के बाद अशोक शर्मा की टिप्पणी वाकई काबिले गौर है. उन्होंने कहा है कि आईएसआई की जितनी मुझे समझ है उसके हिसाब से भारत को मनोवैज्ञानिक चोट पहुंचाने के लिए पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक की जवाबी कार्रवाई भारत के भीतर से होगी. देश में व्यापक साम्प्रदायिक हिंसा भड़काने का काम किया जा सकता है.


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उनका कहना है कि पकिस्तान जवाबी कार्रवाई में स्लीपिंग मॉड्यूल कई धार्मिक स्थलों को एक साथ निशाना बनाएंगे. ऐसे शहरों में कार्रवाई होगी जहाँ मुस्लिम आबादी अल्पसंख्यक होगी, ताकि बहुसंख्यक निश्चित रूप से जवाबी हिंसा की कार्रवाई में ऐसी मूर्खता करें कि पाकिस्तान को भारत में मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा उठाने का मौक़ा मिल जाए. यह स्थान सिर्फ संवेदनशील और बहुचर्चित तीर्थ और मंदिर ही हो सकते हैं. उन्होंने यह संभावना भी जताई है कि बहुसंख्यक मुस्लिम इलाकों में कुछ प्रसिद्ध धर्म स्थलों को नुक्सान पहुंचकर हिन्दुओं को पहले हिंसक बनाया जाएगा फिर उसके बाद हिन्दुओं और भारतीय जनता पार्टी को यूनाइटेड नेशन में ज़लील किया जाएगा.


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अशोक शर्मा का कहना है कि पाकिस्तान को भारत के मुसलमानों के जीने-मरने में कोई दिलचस्पी नहीं है. वह उन्हें सिर्फ चारे के तौर पर इस्तेमाल करना चाहेगा. जनरल जियाउल हक के समय बने ऑपरेशन टोपाक का यही हिस्सा पाक़िस्तान का जवाबी सर्जिकल स्ट्राइक हो सकता है.


भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक पर हमारी खुशियाँ इस हद तक न हों कि हम पकिस्तान के मंसूबों की तरफ से बेफिक्र हो जाएँ. यह बात इसलिए कहनी पड़ रही है कि आज सोशल मीडिया पर सेना का मनोबल बढ़ाने में लगे लोग जोश में होश खोते नज़र आ रहे हैं. यूपी के भाजपा मुख्यालय में आज कई स्वर एक साथ सुनाई दिए थे कि पकिस्तान पर सेना को इतनी कार्यवाही कर देनी चाहिए कि अगले 15 साल तक वह उठने की हिम्मत न कर सके. इस बात पर भाजपा के ऐसे नेता जो चैनलों पर बैठकर मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगलते हैं वह बोले कि युद्ध बच्चों का खेल नहीं है. युद्ध के बाद सदियाँ उस ज़हर को पीने को मजबूर होती हैं. युद्ध से जब तक बचा जा सकता है बचना चाहिए. हम लोग कैमरे पर जो बातें बोलते हैं वह बस बातें ही रहें तो बेहतर हैं. उनका हकीकत बनना बहुत डरावनी बात होगी. भाजपा के यह नेता सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी के पुत्र हैं और 1965 की जंग को इन्होंने बहुत करीब से देखा है. इन्हें पता है कि जब युद्ध होता है तो लोग तो मरते ही हैं सैनिक भी भीतर ही भीतर जलता है.

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