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यह घमासान का पटाक्षेप है या नई पटकथा की तैयारी

 shabahat |  2017-01-01 07:58:13.0

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शबाहत हुसैन विजेता


लखनऊ. जनेश्वर मिश्र पार्क में आज जो हुआ वह समाजवादी पार्टी में पिछले चार महीने से चल रहे घमासान का पटाक्षेप है या फिर आज एक नये घमासान की नई पटकथा लिखी गई है, कहना मुश्किल बात है.


उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव से बड़ा कोई दूसरा नेता नहीं है. देश के सबसे बड़े सूबे के सबसे बड़े नेता को राजनीति के दंगल में इतनी आसानी से चित्त किया जा सकता है. यह बहुत मुश्किल बात लगती है. मुलायम कुश्ती के भी पहलवान हैं और राजनीति के भी पहलवान हैं.


मुलायम ने अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाया था क्योंकि वह प्रधानमंत्री बनने की तैयारी कर रहे थे. मोदी लहर में मुलायम का सपना टूट गया था. यूपी में मुलायम की पूर्ण बहुमत की सरकार थी लेकिन यूपी का नेतृत्व उन्होंने खुद अपने बेटे को सौंपा था. सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन चुनाव क़रीब आने लगा तब अखिलेश पूरी तरह से यूपी की सत्ता पर काबिज़ होने की कोशिश करने लगे तो पूरी पावर अखिलेश के पास चली जाएँ यह बात अखिलेश से वरिष्ठ नेताओं को हज़म नहीं हो रही थीं. शिवपाल यादव चाचा होकर भी भतीजे के नेतृत्व में मंत्री के रूप में काम कर रहे थे लेकिन भतीजे ने मुख्यमंत्री के रूप में काम करना शुरू किया तो घमासान शुरू हो गया.


आज जो हुआ उसके सूत्रधार प्रो. राम गोपाल यादव ने समाजवादी के राष्ट्रीय अधिवेशन में तीन प्रस्ताव पेश किये और तीनों सर्वसम्मत से पास हो गये. मंच पर मुलायम सिंह यादव को छोड़कर पार्टी के सभी बड़े नेता मौजूद थे. यहाँ तक कि मुलायम सिंह यादव के गुरु डॉ. उदय प्रताप सिंह भी अग्रिम पंक्ति में बैठे थे. राम गोपाल यादव ने पहले ही प्रस्ताव में अखिलेश को मुलायम सिंह यादव की जगह राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा तो अखिलेश के मंत्रियों ने सबसे पहले हाथ उठा दिया. सबके हाथ उठ गये तो डॉ. मधु गुप्ता ने भी हाथ उठा दिया. डॉ. उदय प्रताप ने अपनी लाइन में दोनों तरफ़ देखा. सबके हाथ उठे हुए थे, यह देखकर उदय प्रताप सिंह ने भी आधा हाथ उठा दिया.


यह अजब बात थी कि शिष्य की विरासत शिष्य के रहते ट्रांसफर हो रही थी और गुरु को अनमने ढंग से ही सही अपनी सहमति देनी पड़ रही थी. भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की तरह सबसे बड़े समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव भी अपनी ही बनाई पार्टी में मार्गदर्शक की भूमिका में आ गये. अमर सिंह निकाले गये क्योंकि उन्होंने अखिलेश को प्रदेश अध्यक्ष से हटाने के लिये टाइप राइटर मंगवाया था और शिवपाल प्रदेश अध्यक्ष से इसलिये हटाये गए क्योंकि मुख्यमंत्री से सबसे ज्यादा विवाद शिवपाल सिंह यादव से ही था. शिवपाल ने अखिलेश के करीबियों को पार्टी से बाहर निकाल दिया था. आज सपा के निष्कासित सभी नेता राष्ट्रीय अधिवेशन में मौजूद थे.


समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में शामिल होने आये लोगों को यह तो पता था कि अमर सिंह और शिवपाल सिंह यादव पर गाज गिरेगी लेकिन लोगों को यह नहीं पता था कि अचानक मुलायम सिंह यादव पार्टी के हाशिये पर आ जायेंगे.


राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद अखिलेश यादव ने कहा की राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका उन्होंने इसलिए स्वीकार कर ली है कि चुनाव करीब है और पार्टी के खिलाफ साज़िश रचने वाले कहीं एन चुनाव के वक्त नेताजी से फिर से कोई आदेश कराकर चुनाव को बर्बाद न कर दें. उन्होंने कहा कि मैं नेताजी का बेटा हूँ. इस रिश्ते को कोई तोड़ नहीं पायेगा. मैं पूर्ण बहुमत से चुनाव जीतकर नेताजी को तोहफा दूंगा और इसकी सबसे ज्यादा खुशी नेताजी को होगी.


जनेश्वर मिश्र पार्क में आज जिस तरह से समाजवादी पार्टी में तख्ता पलट हुआ उससे एक बार फिर आगरा याद आया. देखने की बात यह होगी कि अखिलेश औरंगजेब की भूमिका में कितनी देर रह पाते हैं क्योंकि यह बात तो तय है कि मुलायम आगरे के किले में क़ैद वह शाहजहाँ नहीं हैं जो ताजमहल को निहारने के सिवाय कुछ कर नहीं पाये.

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