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मुज़फ्फर अली की ज़मीन पर किया वन विभाग ने क़ब्ज़ा

 Sabahat Vijeta |  2016-11-04 13:47:02.0

muzaffar-ali
तहलका न्यूज़ ब्यूरो


लखनऊ. सुपरिचित फिल्म निर्देशक मुज़फ्फ़र अली की पुश्तैनी ज़मीन को झूठे तथ्यों के आधार पर सरकारी बताने और उस ज़मीन पर बसे 600 परिवारों को बेघर करने के वन विभाग के फैसले के खिलाफ आज मुज़फ्फ़र अली ने लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस की और बताया कि उस ज़मीन के सम्बन्ध में चीफ कन्ज़र्वेटर ए.के. जैन द्वारा की गई जांच में यह प्रमाणित भी हो गया है कि वह ज़मीन मेरी पुश्तैनी ज़मीन है और 1952 से अब तक लगातार सरकारी दस्तावेजों में मेरे नाम पर ही दर्ज है. बावजूद इसके मेरा और मेरे परिवार का लगातार मानसिक उत्पीड़न किया जा रहा है.


मुज़फ्फ़र अली ने बताया कि गोला जिले में दाखिल होते ही मेरे दादा का 500 एकड़ का जंगल है. जैसे ही वह जंगल खत्म होता है वहीं पर 10 एकड़ ज़मीन है जिस पर निगाह है. उन्होंने कहा कि उस ज़मीन पर कोटवारा रियासत 600 परिवार पालती है. वहां पर मुलायम आवास योजना के तहत गरीबों के लिए आवास बनाए गए थे. वन विभाग ने उस ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने के लिए उन आवासों को ध्वस्त कर दिया और वहां रह रहे 80 साल के वृद्ध नौकर के साथ रेंजर उमेश चन्द्र राय ने हाथापाई की.


उमेश चन्द्र राय ने इस घटनाक्रम के बाद मुज़फ्फ़र अली और उनके परिवार के खिलाफ एसडीएम गोला की अदालत में मुक़दमा दर्ज करा दिया. एसडीएम गोला की अदालत में पहले ही कुछ लोगों ने मुज़फ्फर अली की पुश्तैनी ज़मीन का दाखिल-खारिज रद्द करने का प्रार्थना पत्र दे रखा है.


मुज़फ्फर अली ने कहा कि मैं उस ज़मीन पर क्रियेटिव कम्युनिटी सेंटर बनाना चाहता हूँ. यह मेरी पुश्तैनी ज़मीन है. अपनी ही ज़मीन को अपना साबित करने के लिए मुझे दौड़ना पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि मैं यह चाहता हूँ कि सरकार उस ज़मीन के सम्बन्ध में हुई जांच की रिपोर्ट का अध्ययन कर ले. उसके बाद ही इन्साफ करे. उन्होंने कहा कि मैं क्रियेटिव आदमी हूँ. इस तरह के कामों में नहीं उलझना चाहता हूँ. उन्होंने कहा कि मैं फिल्म बनाऊँ या फिर ज़मीनों के मसले हल करता घूमूं.


मुज़फ्फर अली ने गोला के उप जिलाधिकारी को लिखी चिट्ठी में यह लिखा है कि 23 अप्रैल 1956 को वनाधिकारी ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया है कि यह ज़मीन श्रीमती कनीज़ हैदर पत्नी राजा साजिद हुसैन की है. अब श्रीमती कनीज़ हैदर की म्रत्यु के भी 50 बरस बीत चुके हैं. उनकी म्रत्यु के बाद से यह ज़मीन लगातार मेरे नाम पर दर्ज है ऐसे में अब उस ज़मीन पर विवाद कैसे खड़ा किया जा सकता है. उन्होंने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले यह बताते हैं कि किसी ज़मीन पर 12 साल से ज्यादा पुराने मामले को नहीं खोला जा सकता. ऐसे में जबकि वन विभाग के किसी भी अधिकारी ने 1960 से अब तक आपत्ति दर्ज नहीं कराई तो अब विवाद कैसे खड़ा किया जा सकता है.


मुज़फ्फर अली ने इस बात पर दुःख जताया है कि उनकी माँ की म्रत्यु के इतने वर्ष के बाद वन विभाग ने उन पर सांठ गाँठ का इलज़ाम लगाया है. वन विभाग से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने किस्से सांठगाठ की थी. उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि सांठगाँठ किस्से हुई थी, किस तारीख को हुई थी और वन विभाग को इसकी जानकारी कब हुई थी. और अगर सांठगाँठ का कोई सबूत नहीं है तो फिर केस का भी कोई औचित्य नहीं है.

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