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सियासत के ये दो “अच्छे लड़के”

 Tahlka News |  2016-09-08 12:26:04.0

सियासत के ये दो “अच्छे लड़के”
उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. गुरुवार को यूपी कैबिनेट की बैठक के बाद खबरनवीसो से मुखातिब होते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी को “अच्छा लड़का” बता दिया. अखिलेश ने कहा कि राहुल अच्छे लडके हैं और यूपी आना जाना तेज करें तो दोस्ती की गुन्जायिश बन सकती है.

अखिलेश यादव की ये चुटकी दरअसल करीब एक महीने पहले राहुल की तुस चुटकी का जवाब था जो राहुल ने अखिलेश पर की थी. जुलाई के आखिरी हफ्ते में राहुल ने रैम्प शो के जरिये जब अपने कार्यकर्ताओं से संवाद किया था तब उनसे अखिलेश के बारे में सवाल हुआ था. जवाब में राहुल ने कहा था “ अखिलेश अच्छा लड़का है मगर उसे काम करने का मौका नहीं मिलता”.

अब जब भारतीय राजनीती के इन दो चर्चित युवाओं ने एक दूसरे को अच्छा लड़का बता दिया है, तब सियासी कयासबाजो ने सूबे के चुनावो में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के संभावित समझौते के संकेत पढने में खुद को झोंक दिया है. कयास लगाये जा रहे हैं कि एक दूसरे पर हमेशा तल्ख़ टिप्पणियों से बचते रहे इन दो अच्छे लडको की दोस्ती क्या सियासत में भी परवान चढ़ेगी ?


राहुल और अखिलेश में बहुत कुछ सामान है और बहुत कुछ विपरीत. दोनों ही सियासत में विरासत के अलमबरदार हैं. यानी अपने सियासी परिवार के वारिस, दोनों लगभग हमउम्र हैं, दोनों की तालीम विदेशो में हुयी है, दोनों गैर भाजपावाद के झंडाबरदार हैं , दोनों का दावा है कि वे सांप्रदायिक सियासत के खिलाफ हैं, और दोनों ही नरेन्द्र मोदी पर हमलावर रहते हैं मगर इन समानताओं के बावजूद दोनों के बीच बहुत सारे विरोधाभास भी हैं.

राहुल गाँधी सियासत में अपनी स्वीकार्यता की तलाश कर रहे हैं और अखिलेश यादव की स्वीकार्यता अब निर्विवाद है. राहुल गाँधी और अखिलेश पहली बार 2012 के विधान सभा के चुनावी समर में आमने सामने थे. दोनों संसद के सदस्य थे और दोनों को पहली बार स्वतंत्र रूप से अपनी छवि का निर्माण करना था. मेहनत भी दोनों ने की. राहुल ने बुदेलखंड और दलितों को लक्ष्य पर रखा और अखिलेश ने युवाओं के साथ साथ विकास के अपने एक दृष्टिकोण को. नतीजे अखिलेश के पक्ष में जबरदस्त तरीके से गए और वे भारत के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बन गए. राहुल गाँधी के व्यक्तित्व पर अखिलेश का दृष्टिकोण भारी पड़ा.

इसके बाद से अब लगभग 5 साल होने को हैं और अखिलेश यादव एक चतुर राजनेता के रूप में उभर चुके हैं जो न सिर्फ अपने विकास के माडल को दिखने के लिए अपना शो केस सजा चुका है बल्कि पार्टी और परिवार के अंदरूनी उठापटक को भी सम्हालने में सक्षम है. उनकी तुलना में राहुल को अभी कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं की आलोचना से पार पाना हमेशा मुश्किल रहा है. 2012 के बाद 2014 का चुनाव हारना भी राहुल की सियासी शिकस्त मानी जाती है मगर गांधी परिवार के विरासत के वारिस के इर्द गिर्द सिमटी कांग्रेस में उनका विरोध बिना किसी नतीजे के ख़त्म भी हो जाता है.

हांलाकि 2014 की हार के बाद कुछ दिन अज्ञातवास में रहने के बाद लौटे राहुल के तेवर बदले हैं, वे संसद से ले कर सड़क तक आक्रामक हुए हैं. हालिया दिनों में ब्ल्यू डेनिम और कुरते में बढ़ी हुयी दाढ़ी के साथ वे एक बेचैन भारतीय युवा की तरह दिखने की कोशिश में हैं उनको सुनने लोग भी आ रहे हैं और उन्होंने नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ बहुत तीखे कुछ जुमले में दिए हैं जो चर्चा में रहे. अब राहुल कांग्रेस के ढांचे से ले कर रणनीति तक को बदलने में आमादा दिखते हैं लेकिन उनको खुद को स्थापित करने के लिए एक बड़ी जीत की दरकार है जिसके लिए राहुल विपक्ष की अपनी भूमिका का इस्तेमाल करने से नहीं चूकना चाहते.

इसके विपरीत अखिलेश यादव ने अपने पार्टी की आधारभूत संरचना से कभी छेड़छाड़ नहीं की. वे समाजवादी पार्टी के अक्सर बेलगाम होने वाले कैडर की अनदेखी कर जाते हैं और कभी डीपी यादव तो कभी मुख़्तार अंसारी के पार्टी में आने का विरोध कर खुद के अपराधियों का विरोधी होने का सन्देश भी दे देते हैं. बतौर मुख्यमंत्री अखिलेश ने विकास का एक दृष्टिकोण दिया है जिस पर एपीजे अब्दुल कलाम से ले कर जल पुरुष राजेंद्र सिंह तक की मुहर वे समय समय पर लगवाते रहे हैं.

मगर सियासत के मैदान में फ़िलहाल एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा सम्हाले ये दोनों नेता एक दूसरे को जब अच्छा लड़का कहते हैं तो अनायास नहीं है. सियासत के मैदान के योद्धा यदि कुछ बोलते हैं तो उसके निहितार्थ होते ही हैं, राहुल की बात का जवाब गुरुवार को अखिलेश ने दिया तो इस बात की संभावना भी बनाने लगी कि क्या यूपी विधानसभा चुनावो में कोई नयी जुगलबंदी सामने आएगी ?

फ़िलहाल तो दोनों पार्टियाँ अकेले ही चुनाव लड़ने का दावा कर रही हैं मगर यह इशारा शायद चुनाव के बाद उभरे परिदृश्य में कुछ गुल खिला ही दे.

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