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मायावती का मानना है कि दलित जितना उत्पीड़ित होगा,उतना BSP का वोट मजबूत होगा: बीजेपी

 Avinash |  2017-02-06 17:15:28.0

मायावती का मानना है कि दलित जितना उत्पीड़ित होगा,उतना BSP का वोट मजबूत होगा: बीजेपी

तहलका न्यूज़ ब्यूरो
लखनऊ. भारतीय जनता पार्टी मुख्यालय में केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावर चन्द्र गहलोत ने सोमवार को प्रेसवार्ता की. इस दौरान उन्होंने कहा, सपा-बसपा एवं कांग्रेस को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पिछड़ो व दलितों के आरक्षण पर अपना रूख साफ करना चाहिए।

गहलोत ने उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा की जुगलबंदी से दलित दमन बसपा सरकार की तरह ही सपा सरकार में बदस्तूर जारी रहा। बसपा सुप्रीमों मायावती का मानना है कि दलित जितना अधिक उत्पीड़ित होगा उतना ही बसपा को वोट मजबूत होगा। इसीलिए सपा सरकार के पांच सालों के दलित उत्पीड़न के भयावह दौर में उना और हैदराबाद दौड़ने वाली बहिन जी ने प्रदेश के दलितों का हाल तक नहीं पूछा। दलितों के वोटों का व्यापार कर सुप्रीमों बनी बहिन जी कन्नौज और आजमगढ में हुई दलित उत्पीड़न की घटनाओं को भी दूर से देखती रही और मूकदर्शक बनी रही।

दलितों पर अत्याचार का आलम यह है कि यूपी में सबसे ज्यादा दलित उत्पीड़न के मामले दर्ज किए गए हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2014 में पूरे देश में दलितों के विरुद्ध 47,064 अपराध घटित हुए थे, इनमें 8,075 मामले अकेले उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए। यूपी में दलित उत्पीड़न के हर रोज औसतन 20 मामले दर्ज किए गए। देशभर में दलितों के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न के मामले में अकेले यूपी की हिस्सेदारी 17 फीसदी से भी ज्यादा है।
उत्तर प्रदेश में 2014 में दलित उत्पीड़न की थानों में दर्ज घटनाओं को देखें तो बहुत गंभीर हालात है। दलितों की हत्या से जुड़े 237 मामले, आगजनी से जुड़े 27 मामले, बलात्कार से जुड़े 413 मामले, गंभीर चोटों से जुड़े 327 मामले अन्य अपराधों से जुड़े 6573 मामले यानि अनुसूचित जाति.जनजाति अत्याचार निवारण कानून के अंतर्गत 7577 अभियोग दर्ज किए गए। जबकि बहुत सी घटनाओं को थानों में दर्ज ही नही किया जाता। दर्ज घटनाएं भी पूरी सच्चाई को उजागर नहीं करतीं। क्योंकि पुलिस प्रशासन की सामंती मानसिकता के चलते कुछ आपराधिक घटनाओं की रिपोर्ट दर्ज करने की बजाय पुलिस मामले को रफा-दफा कर देती है और थाने से भगा देती है।

एससी/एसटी की नियमावली 1995 में आदेश है कि इस एक्ट के मामलों की सुनवाई हेतु विशेष न्यायालयों की स्थापना की जाएगी परन्तु उत्तर प्रदेश में ऐसा न करके केवल वर्तमान अदालतों को ही विशेष अदालतों का नाम दे दिया गया है जिस से इन मामलों के निस्तारण में लम्बी अवधि लगती है। इससे यह भी लगता है कि उत्तर प्रदेश में दलितों के उत्पीड़न के अपराधों को रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाही नहीं की गई है और न ही दोषियों को सजा दिलाने के लिए उचित व्यवस्था समाजवादी सरकार को तो छोड़िये मायावती ने भी इस ओर कभी ध्यान नहीं दिया।

थानों में दलितों की नहीं होती सुनवाई
उत्तर प्रदेश में दलितों के साथ नाइंसाफी का आलम यह है कि यहां के थानों में दलितों की शिकायत तक दर्ज नहीं की जाती है। सपा सरकार में थानों पर थानाध्यक्षों की नियुक्ति में 21 प्रतिशत का आरक्षण होने के बावजूद भी थानों पर उन की बहुत कम नियुक्ति की गयी ।जिस का सीधा प्रभाव दलितों सम्बन्धी अपराध के पंजीकरण पर पड़ा। पुलिस वाले थाने में शिकायत दर्ज करवाने आए दलितों को उल्टा डांट के भगा देते हैं।
2015 में उत्तर प्रदेश दलितों और महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक राज्य रहा। 2015 में उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के 10.9 फीसदी जबकि दलित उत्पीड़न के 18.6 फीसदी मामले दर्ज हुए। बुलंदशहर में हुए सामूहिक बलात्कार ने राज्य में बिगड़ती कानून व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी थी।
हत्याः वर्ष 2015 में पूरे देश में दलितों की हत्यायों की संख्या 707 थी जिन में अकेले उत्तर प्रदेश में 204 हत्याएं हुयीं। इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.4 के विपरीत उत्तर प्रदेश की दर 0.5 रही जो की काफी ऊँची है।

बलात्कारः वर्ष 2015 में पूरे देश में दलित महिलाओं के बलात्कार के 2,332 अपराध घटित हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 444 तथा बलात्कार के प्रयास के 22 मामले दर्ज हुए। यद्यपि इस अपराध की राष्ट्रीय दर 1.2 के विपरीत उत्तर प्रदेश की दर 1.1 रही परन्तु कुल अपराधों की संख्या काफी अधिक रही।

शीलभंग के प्रयास में हमलाः वर्ष 2015 में पूरे देश में दलित महिलाओं के शीलभंग के प्रयास में हमला के 2,800 अपराध घटित हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 756 अपराध हुए। इस अपराध की राष्ट्रीय दर 1.4 के विरुद्ध उत्तर प्रदेश की यह दर 1.8 रही जो कि बहुत अधिक है।

यौन उत्पीड़नः वर्ष 2015 में पूरे देश में दलित महिलाओं के यौन उत्पीड़न के 1,317 अपराध दर्ज हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 704 मामले घटित हुए। इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.7 रही जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 1.7 थी जो कि देश में सब से ऊँची है।
विवाह के लिए अपहरणः 2015 में पूरे देश में विवाह के लिए अपहरण के कुल 455 मामले घटित हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 338 अपराध घटित हुए। इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.2 के विपरीत उत्तर प्रदेश की यह दर 0.8 रही जो कि पूरे देश में सब से ऊँची है। इसी प्रकार पूरे वर्ष में दलितों के अपहरण के 687 मामले दर्ज हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 415 मामले घटित हुए।

गंभीर चोटः उपरोक्त अवधि में पूरे देश में गंभीर चोट के 1,007 मामले दर्ज हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 366 मामले घटित हुए। इसकी राष्ट्रीय दर 0.5 रही जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 0.9 रही जो कि काफी अधिक है।

बलवा: वर्ष 2015 में पूरे देश में दलितों के विरुद्ध बलवे के 1,465 मामले दर्ज हुये जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 632 मामले घटित हुए। इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.7 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 1.5 रही जो कि काफी अधिक है।

एससी/एसटी एक्ट के अपराध:
वर्ष 2015 में पूरे देश में दलितों के उत्पीडन के 38,564 अपराध दर्ज हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 8, 357 केस दर्ज हुए। इस एक्ट के अंतर्गत अपराधों की राष्ट्रीय दर 19.2 रही जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 20.2 रही जो कि काफी अधिक है।
मायावती जी अपनी गलतियों का ठीकरा भाजपा पर फोड़ रही हैं पर मायावती यह अच्छी तरह से जानती हैं कि दलितों का एक बड़ा हिस्सा 2012 के असेंबली चुनाव में ही उस से अलग हो गया था। इसका मुख्य कारण यह था कि मायावती ने दलित राजनीति को उन्हीं गुण्डों, माफियों और पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया था। मायावती का बोली लगा कर टिकट बेचना और दलित वोटों को भेड़ बकरियों की मानिंद किसी के भी हाथों बेच देना और इस वोट बैंक को किसी को भी हस्तांतरित कर देने का दावा करना दलितों को अब रास नहीं आता है। इसीलिए पिछले असेंबली चुनाव और लोक सभा चुनाव में दलितों ने उसे उसकी हैसियत बता दी थी। किसी भी दलित विकास के एजंडे के अभाव में दलितों को मायावती की केवल कुर्सी की राजनीति भी पसंद नहीं आई है क्योंकि इस से मायावती के चार बार मुख्य मंत्री बनने के बावजूद भी दलितों की माली हालत में कोई परिवर्तन नहीं आया है।

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