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ये हैं देश के इकलौते वकील हैं जो संस्कृत में करते हैं वकालत

 Tahlka News |  2016-05-08 10:17:04.0

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तहलका न्यूज ब्यूरो
वाराणसी: 
बनारस के श्यामजी उपाध्याय पिछले 38 साल से संस्कृत भाषा में ही वकालत कर रहे हैं। आज के जमाने में लुप्त होती संस्कृत भाषा पर वो चिंतित भी हैं और बेफिक्र भी। रोजाना बच्चों को मुफ्त संस्कृत पढ़ाकर वो इस भाषा के प्रचार- प्रसार के लिए काम भी कर रहे हैं। 1978 से संस्कृत का दामन उन्होंने थामा है और अबतक 60 उपन्यास वो संस्कृत में लिख चुके हैं। उन्हें वर्ष 2003 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने संस्कृत भाषा में अभूतपूर्व योगदान के लिए इनको “संस्कृतमित्रम्” नामक राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया था


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वाराणसी की कचहरी में संस्कृत को जीवंत करने वाले एडवोकेट आचार्य पंडित श्यामजी उपाध्याय का, जो पिछले कई सालों से संस्कृत में वकालत कर रहे हैं। देववाणी संस्कृत के प्रति भले ही लोगों का रुझान कम हो लेकिन वाराणसी के एडवोकेट आचार्य पंडित श्यामजी उपाध्याय का संस्कृत के लिए समर्पण शोभनीय है। श्यामजी का ये दावा है कि आज के जमाने में वो देश के इकलौते ऐसे वकील हैं जो कोर्ट में संस्कृत में जिरह करते हैं और उनकी ये मांग है कि इसके लिए उनका नाम गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी शामिल किया जाए।


सन 1976 से वकालत की शुरूआत करने वाले आचार्य पंडित श्यामजी उपाध्याय 1978 में अधिवक्ता के तौर पर रजिस्टर्ड हुए थे, जिसके बाद से इन्होंने देववाणी संस्कृत को ही तरजीह दी है। सभी अदालती कामकाज जैसे शपथपत्र, प्रार्थनापत्र, दावा, वकालतनामा और यहां तक की बहस भी संस्कृत में ही करते चले आ रहे हैं। यहां तक की बहस भी संस्कृत में करते चले आ रहे हैं। पिछले 4 दशकों में संस्कृत में वकालत के दौरान श्यामजी के पक्ष में जो भी फैसला और आदेश हुआ, उसे जज साहब ने संस्कृत में या तो हिंदी में सुनाया।


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संस्कृत भाषा में कोर्टरूम में बहस सहित सभी लेखनी प्रस्तुत करने पर सामने वाले पक्ष को असहजता होने के सवाल पर श्यामजी ने बताया कि वो संस्कृत के सरल शब्दों को तोड़-तोड़कर प्रयोग करते है, जिससे जज से लेकर विपक्षियों तक को कोई दिक्कत नहीं होती है और अगर कभी सामने वाला राजी नहीं हुआ तो वो हिंदी में अपनी कार्यवाही करते हैं।


सिर्फ कर्म से ही नहीं बल्कि संस्कृत भाषा में आस्था रखने वाले श्यामजी हर वर्ष कचहरी में संस्कृत दिवस समारोह भी मनाते चले आ रहे हैं। लगभग 5 दर्जन से भी अधिक अप्रकाशित रचनाओं के अलावा श्यामजी की 2 रचनाएं “भारत-रश्मि” और “उद्गित” प्रकाशित हो चुकि है। “भारत-रश्मि” की खासियत यह है कि इसमें क्रिया और सर्वनाम का प्रयोग नहीं किया गया है। जबकि “उद्गित” में एक-एक अक्षर में काव्य रचना है। न केवल संस्कृत बल्कि हिंदी और अंग्रेजी भाषा में भी पारंगत श्यामजी ने दावा किया कि संस्कृत में इतने लंबे समय तक वकालत करने वाला कोई और नहीं है। इसलिए उनका नाम गिनीज बुक में दर्ज होना चाहिए।


संस्कृत भाषा को लेकर श्याम जी का जुनून यहीं नहीं थमता है। कचहरी खत्म होने के बाद इनका शाम का वक्त अपनी चौकी पर संस्कृत के छात्रों और संस्कृत के प्रति जिज्ञासु वकीलों को पढ़ा कर बीतता है। संस्कृत भाषा की यह शिक्षा श्यामजी निःशुल्क देते हैं।


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