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EXCLUSIVE : क्या जलियांवाला कांड की सिहरन से बड़ी है अम्बेडकर जयन्ती

 Sabahat Vijeta |  2016-04-14 14:05:02.0

jaliyanwalaशबाहत हुसैन विजेता


लखनऊ, 14 अप्रैल. देश में आज संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्मदिन मनाने की होड़ लगी है. प्रधानमंत्री से लेकर सभी राज्यों के मुख्यमंत्री आज सारा काम छोड़कर बाबा साहब को श्रद्धा सुमन अर्पित करने में लगे हैं. खुद को बाबा साहब की असली वारिस समझने वाली यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने तो आज रैली आयोजित करते हुए मिशन-2017 का श्रीगणेश कर दिया. निसंदेह डॉ. भीमराव अम्बेडकर का योगदान इतना बड़ा है कि हर किसी को उनकी याद में कार्यक्रम करना ही चाहिए लेकिन यह काम तब और अच्छा हो जाता जबकि 14 अप्रैल की छुट्टी करने वालों और डॉ. अम्बेडकर को वोटबैंक में बदलने की कोशिश करने वाले 13 अप्रैल को भी याद रख पाए होते. हकीकत में अगर 13 अप्रैल न होता तो हम भारतीय 14 अप्रैल को सेलिब्रेट करने के लिए न जाने कितना इंतज़ार और करते. एक फेसबुक फ्रेंड ने आज यह मुद्दा छेड़ा तो मन हुआ कि इस मुद्दे पर कुछ बात कर ही ली जाए.


ambedkar-jaliyanvalaवर्ष 1919 में 13 अप्रैल की तारीख ब्रिटिश हुकूमत की जालीमाना तस्वीर को दुनिया के सामने रख पाई थी. वह बैसाखी का दिन था. पंजाब के अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में इकठ्ठा हुए करीब 15 हज़ार निहत्थे भारतीयों पर ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल डायर ने गोलियां चलवा दी थी. अचानक सामने से आई मौत से घबराए सैकड़ों लोग तो कुएं में कूदकर मर गए थे. भारतीय आजादी के आंदोलन की सफलता और लोगों का बढ़ता आक्रोश देख ब्रिटिश राज ने दमन का रास्ता अपना लिया था. यह दमन की पराकाष्ठा थी. यूँ भी 6 अप्रैल की हड़ताल की सफलता से पंजाब का प्रशासन बौखलाया हुआ था. पंजाब के दो बड़े नेताओं, सत्यापाल और डॉ. किचलू को गिरफ्तार कर निर्वासित किया जा चुका था. जिससे अमृतसर के लोगों में गुस्सा भरा हुआ था.


jaliyanwala-2मार्शल लॉ लागू किये जाने के बावजूद 13 अप्रैल को बैसाखी के दिन आंदोलनकारी जलियांवाला बाग में जमा होने लगे तो पंजाब का प्रशासन गुस्से में आ गया. उसने तय किया कि आज ऐसा सबक सिखाया जाएगा कि ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कोई भारतीय कभी सर नहीं उठा पायेगा. जनरल डायर को यह ज़िम्मेदारी सौंपी गई कि ऐसा एक्शन लो कि लोग दहल जाएँ.


Jallianwala-3दो दिन पहले हुए पुलिस गश्त और मार्शल लॉ की परवाह न करते हुए करीब 15 हज़ार लोग जलियांवाला बाग में जमा हो गए. नेताओं के भाषण शुरू होते इसके पहले ही जनरल डायर सैनिक टुकड़ी लेकर अचानक बाग में पहुंचा. उसने देखा कि इतनी बड़ी संख्या में लोग जमा हैं तो अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ वहां पोजिशन ली और बिना किसी चेतावनी के निहत्थों पर गोलीबारी शुरू कर दी. अचानक आई मौत से भगदड़ मच गई. देखते ही देखते हर तरफ लाशें बिछ गईं. इस भीड़ पर 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं.


jallianwala-4बच्चों-बूढ़ों और महिलाओं समेत सैकड़ों भारतीय इस गोलीकांड में शहीद हो गए. ब्रिटिश शासन की इस सबसे बर्बर हरकत पर पूरी दुनिया हिल गई. चंद मिनट में अनगिनत जानें चली गईं. इस निंदनीय काण्ड के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने जनरल डायर को सम्मानित किया. हालांकि दुनिया के दबाव में ब्रिटिश हुकूमत को इस काण्ड के लिए निंदा प्रस्ताव पास करना पड़ा. इसी बर्बरता ने भारत में ब्रिटिश राज की नींव हिला दी.


jaliyanwala-5इस वीभत्स काण्ड के बाद डायर ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बताया कि उस पर भारतीयों की एक फ़ौज ने हमला किया था जिससे बचने के लिए उसको गोलियां चलानी पडीं. ब्रिटिश हुकूमत हालांकि सच्चाई जानती थी लेकिन उसने डायर के फैसले को सही मानते हुए अमृतसर और अन्य क्षेत्रों में भी मार्शल लॉ लगा दिया.


इस हत्याकाण्ड की सारी दुनिया में हुई निन्दा की वजह से सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एडविन मॉंटेग्यु ने 1919 के अंत में इसकी जांच के लिए हंटर कमीशन नियुक्त किया. कमीशन के सामने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने स्वीकार किया कि वह गोली चलाने का निर्णय पहले से ही ले चुका था और वह उन लोगों पर चलाने के लिए दो तोपें भी ले गया था जो उस संकरे रास्ते से नहीं जा पाई थीं.


jaliyanwala-6हंटर कमीशन की रिपोर्ट आई तो 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को पदावनत होना पड़ा. उसे कर्नल बना दिया गया और भारत में उसकी पोस्टिंग को निरस्त करते हुए उसे ब्रिटेन वापस भेज दिया गया. दबाव बढ़ने पर डायर को इस्तीफ़ा भी देना पड़ा.


13 अप्रैल 1919 को अंजाम दी गई इस दिल दहला देने वाले काण्ड की सिहरन आज भी बाकी है. इसी काण्ड ने ब्रिटिश हुकूमत को भारत छोड़ने वाला रास्ता तैयार किया था. यह काण्ड न होता तो शायद भगत सिंह को बंदूकें बोने की ज़रुरत न पड़ती. तब शायद बहरी ब्रिटिश हुकूमत के कान खोलने के लिए संसद के बाहर बम न फोड़ने पड़ते. तब शायद क्रान्ति की वह ज्वाला प्रज्वलित ही न हो पाती जिसने ब्रिटिश हुकूमत के परवाज़ वाले परों को जलाकर रख दिया और उन्हें यहाँ से भागना पड़ा. यह काण्ड तो देश की आजादी की नींव को मज़बूत करने वाला काण्ड था.


संविधान तो आज़ाद भारत में लिखा गया. अपने संविधान निर्माता की यशगाथा हम गायें. उनके यशस्वी काम के यश को हम याद करें. दुनिया रहने तक बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का सम्मान बना रहे, बढ़ता रहे लेकिन अच्छा हो कि अम्बेडकर जयन्ती से ठीक एक दिन पहले के उस काण्ड को भी याद रखा जाए जिसने भारतीय संविधान के लिए रास्ता तैयार किया. अम्बेडकर के नाम पर सियासत भी हो तो सह लेंगे लेकिन पहले उन्हें भी याद कर लो जो लौट के घर न आये.

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