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देखते हैं इस बार रावण को मोदी फूंकेंगे या अखिलेश

 Sabahat Vijeta |  2016-10-10 11:21:43.0

modi
शबाहत हुसैन विजेता


लखनऊ. समाजवादी परिवार में जो चल रहा है उसने चुनाव की तैयारियां कर रहे राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी है. यह पहली बार हुआ है कि एक राजनीतिक दल में वर्चस्व की जंग से दूसरे दलों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंची हैं. और कोई वक़्त होता तो शायद इस मौक़े को चाय पार्टियों से सेलीब्रेट किया जा रहा होता लेकिन मौक़ा चुनाव का है तो डर इस बात से लग रहा है कि यह कहीं राजनीति के महारथी मुलायम सिंह यादव का वह दांव तो नहीं है जो सोशल इंजीनियरिंग, मन्दिर बनाने का चारा, प्रशांत किशोर की कोशिशों और बेमेल गठबन्धनों का गला घोंट देगा. चर्चा अब यह शुरू हुई है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दशहरे पर लखनऊ यात्रा कहीं इस समीकरण पर असर डालने के लिये ही तो नहीं है. हो सकता है कि यह चर्चा बस यूँ ही शुरू हो गई हो लेकिन इसे कौन नकारेगा कि केन्द्र में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी के राज्य मुख्यालय में दबी ज़बान से नेता अब यह भी कहने लगे हैं कि जो भी हो अखिलेश अच्छा नेता तो है ही. उनके साथ उनका परिवार बहुत गलत कर रहा है. भाजपा में ऐसे भी चेहरे हैं जो ज़रुरत पड़ने पर अखिलेश को सपोर्ट भी कर सकते हैं.


मुलायम सिंह यादव राजनीति की वह पहेली हैं जिसे राजनीति के नये खिलाड़ी हल करना तो दूर पढ़ भी नहीं सकते. मुलायम का मानना है कि चुनाव में चर्चा, पर्चा और खर्चा हो तो कोई हरा नहीं सकता है. विकास के नारे पर साढ़े चार साल तक स्मूथली चली सरकार में आख़री छह महीने मुख्यमंत्री की राह में कांटे क्यों बोए गये ? बस यही मुद्दा ऐसा मुद्दा है जिसने विपक्षियों की नींद हराम कर दी है.


चाचा भतीजे में जिस दिन झगड़ा शुरू हुआ था उस दिन समाजवादी पार्टी में घबराहट दिखी थी लेकिन दूसरी पार्टियों में जश्न का माहौल था. अखिलेश सरकार की विकास यात्रा से घबराया विपक्ष घर में ही छिड़ी जंग से यह समझने लगा था कि बिल्ली के भाग्य से छीका फूट गया है. लगने लगा था कि अखिलेश की मुट्ठी से सत्ता फिसल गई है. लगा था कि शिवपाल ही वह खलनायक हैं जो अखिलेश को सत्ता से दूर करेंगे और उनकी पार्टी का सत्ता में रास्ता साफ़ करेंगे लेकिन अखिलेश ने इस मामले को एक जेंटिलमैन की तरह से टेकिल कर हालात को पूरी तरह से अपने पक्ष में कर दिया.


इसी बीच सर्वे भी हो गया और अखिलेश के पक्ष में 65 फीसदी, मुलायम के पक्ष में 19 फीसदी और शिवपाल के पक्ष में सिर्फ 16 फीसदी लोगों का रुझान देख दूसरे दलों की नींद उड़ गई. कोई भी राजनीतिक दल नहीं बचा जिसका चचा-भतीजे की जंग को लेकर बयान न आया हो. हालांकि यह जंग परिवार की थी इसमें किसी बाहरी का हस्तक्षेप होना भी नहीं चाहिए था लेकिन लगा तो यह था कि समाजवादियों के हाथ से परिवार के झगड़े ने सत्ता छीन ली है लेकिन जिस तरह से अखिलेश सुपर हीरो की तरह उभरे उसने सभी की नींदें उड़ा दीं.


खुद भारतीय जनता पार्टी में भी अखिलेश को लेकर काफी सहानुभूति है. ज़्यादातर भाजपा नेता अखिलेश के पक्ष में सिर्फ इसलिए खड़े हैं क्योंकि उन्होंने साढ़े चार साल की सरकार में कभी किसी भी नेता को अपशब्द नहीं कहे. सरकार बनाने के बाद लगातार काम किया. कानून व्यवस्था की बात छोड़ दी जाए तो सरकार अच्छी ही चली है. अखिलेश बतौर मुख्यमंत्री नए थे इसलिए सीनियर नेता अपनी-अपनी तरह से सरकार चलाते थे. साल भर से वह फ़ार्म में आये और इस मिथक को तोड़ा कि यूपी में पांच मुख्यमंत्री हैं. भ्रष्ट और दागी मंत्रियों को बर्खास्त किया. दागदार छवि वालों को समाजवादी पार्टी में नहीं आने दिया. कुल मिलकर अपनी छवि मिस्टर क्लीन की बना ली.


मायावती और मुलायम की कभी नहीं पटी लेकिन मायावती ने कभी सीधे अखिलेश को हिट नहीं किया. सरकार बनाने के बाद अखिलेश ने जब सरकार को समझने के लिए छह महीने मांगे तो मायावती ने भी फ़ौरन छह महीने दे देने की हामी भर ली. अब तो साढ़े चार साल बीत गए अखिलेश और मायावती में बुआ-भतीजे का रिश्ता भी बन गया. अखिलेश ने कभी बुआ का अपमान नहीं किया और बुआ ने भी स्नेह में कमी नहीं आने दी.


रिश्ते-नाते अपनी जगह लेकिन सियासत करनी है तो रिश्तों की तिलांजली देनी ही पड़ेगी. मायावती ने अखिलेश को मना कर दिया कि वह उन्हें बुआ न कहें. आज्ञाकारी भतीजे की तरह भतीजे ने भी पत्थर वाली सरकार नाम से उनका नया नामकरण कर दिया.


भाजपा में भी अखिलेश का कोई विरोधी नहीं. स्क्रीन पर कुछ भी बोलें लेकिन दिलों में साफ्ट कार्नर तो है ही. भाजपा भ्रष्टाचार के खिलाफ है और अखिलेश भी भ्रष्टाचार के खिलाफ ही जंग कर रहे हैं ऐसे में दोनों का एजेंडा भी एक ही है लेकिन सियासत करनी है तो चुनाव भी लड़ना है और सत्ता में वापसी भी करनी है. ऐसे में प्रधानमंत्री की लखनऊ यात्रा के लिए कोई बहाना तो चाहिए ही था. रावण दहन के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लखनऊ पहुँच रहे हैं. इधर अखिलेश ने भी एलान कर दिया है कि रावण मैं ही फूकूँगा. देखना है कि इस दशहरे पर रावण कौन फूंकता है.

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