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मुख्तार मामले में क्या रंग लाएगी सीएम की सख्ती !

 Tahlka News |  2016-06-22 10:05:54.0

akhilesh gusse men
उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. बाहुबली विधायक मुख़्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के समाजवादी पार्टी में विलय के मामले में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सख्त तेवरों ने समाजवादी पार्टी में खलबली मचा दी है. अखिलेश के गुस्से की गाज सबसे पहले इस विलय के पैरोकार कैबिनेट मंत्री और मुलायम सिंह के पुराने साथी बलराम यादव की बर्खास्तगी के रूप में गिरी है.

मंगलवार की घटना के बाद बुधवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने सारे कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं. आज उनका जनता दर्शन कार्यक्रम भी निरस्त कर दिया. सूत्रों के अनुसार सीएम ने कारागार मंत्री बलवंत सिंह रामूवालिया को भी तलब कर लिया. वे रामूवालिया से मुख़्तार अंसारी के रातो रात गोपनीय तरीके से आगरा जेल से लखनऊ जेल ट्रांसफर करने के मामले में स्पष्टीकरण चाहते हैं.


अखिलेश के तेवरों ने बड़े बड़े नेताओं के होश फाख्ता कर दिए हैं. बर्खास्त कैबिनेट मंत्री बलराम सिंह यादव ने बुधवार को कह दिया कि वे समाजवादी थे हैं और रहेंगे. उनकी लाश भी समाजवादी झंडे में ही लपेटी जाएगी.

इस बीच पार्टी के कद्दावर नेता शिवपाल यादव 8 कैबिनेट मंत्रियों के साथ सीएम अखिलेश यादव से मिलने पहुँच गए. शिवपाल यादव ने बुधवार को कहा कि कौमी एकता दल, अफजाल अंसारी की पार्टी थी न कि मुख्तार अंसारी की. मुख्तार अंसारी जेल में हैं और उन्हें पार्टी में नहीं लिया गया है. बलराम यादव की सपा सरकार से छुट्टी पर शिवपाल ने कहा कि आखिर उनका इस्तीफा क्यों लिया गया इसकी जानकारी उन्हें नहीं है. उनका बस इतना ही कहना था कि ये मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार है कि वह सरकार में किसे रखते हैं और किसे नहीं.

हालाकि शिवपाल यादव ने इस विलय के लिए सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की सहमती भी बताई.

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इसके पहले भी पार्टी के कुछ निर्णयों पर अपनी तल्खी दिखा चुके हैं. अखिलेश के करीबी माने जाने वाले आनंद भदौरिया और सुनील साजन को जब पार्टी ने निकल दिया था तब भी अखिलेश ने अपनी नाराजगी जाहिर की थी. वे सैफई महोत्सव का उद्घाटन में भी नहीं गए और बाद में पार्टी में इन दोनों नेताओं की न सिर्फ वापसी हुयी बल्कि उन्हें विधान परिषद् का सदस्य भी बनाया गया.

इसी तरह प्रतापगढ़ में हुए पुलिस अधिकारी जिया उल हक़ की हत्या के बाद भी उन्होंने रघुराज प्रताप सिंह को कैबिनेट से बाहर कर दिया था.
ख़राब कानून व्यवस्था के आरोपों से जूझ रहे अखिलेश यादव अपनी छवि को ले कर बहुत ही सतर्क है. वे कतई नहीं चाहते कि बाहुबलियों के पक्षधर के रूप में दिखाई दे. इस बात की शुरुआत उन्होंने 2012 में डीपी यादव के विरोध के साथ कर दी थी.

लेकिन इस बार मामला और भी गंभीर है. देखना होगा कि इस सत्ता संघर्ष में अखिलेश यादव खुद को किस तरह बचा पाते हैं. पार्टी ने 25 जून को संसदीय दल की बैठक बुलाई है और 27 जून को अखिलेश अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे. ये दो महत्वपूर्ण कार्यक्रम तय कर देंगे कि पार्टी में सत्ता संतुलन किस और झुकता है.

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