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महिलाओं को शनि मंदिर में प्रवेश से रोका, हुई हाथापाई

 Tahlka News |  2016-04-02 17:53:18.0

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अहमदनगर(महाराष्ट्र), 2 अप्रैल.  बंबई उच्च न्यायालय ने एक दिन पहले दिए गए फैसले कि कोई भी कानून पूजास्थलों में महिलाओं को प्रवेश करने से नहीं रोकता, के बावजूद शनि शिंगणापुर मंदिर में महिला कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट की गई और ग्रामीणों ने उन्हें पूजा करने से रोक दिया। 'भूमाता रणरागिनी ब्रिगेड' की अध्यक्ष तृप्ति देसाई ने लगभग 200 महिला समर्थकों के साथ जब शनि मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की तो गांव के सैकड़ों लोगों ने मानव श्रृंखला बनाकर महिलाओं को शनि मंदिर में जाने से रोक दिया। ग्रामीणों में 300 से ज्यादा महिलाएं भी शामिल थीं।

तृप्ति ने संवादताओं से कहा, "यह बंबई उच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना है। अदालत ने आदेश दिया था कि अगर महिलाओं को रोका जाए तो पुलिस हस्तक्षेप करे और उन्हें पवित्र स्थल तक जाने दे।"


तृप्ति ने चेतावनी दी कि अगर महिलाओं को पुलिस की नाक के नीचे ही पूजा करने से रोका गया तो वह संबंधित अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराएंगी।

ग्रामीणों ने मंदिर में प्रवेश करने जा रही महिलाओं पर हमला बोल दिया। इस दौरान उग्र ग्रामीणों ने धक्का-मुक्की और मारपीट को घटना को दिया जबकि पुलिस चारों तरफ से मंदिर को घेरे रही।

ग्रामीणों द्वारा की गई धक्कामुक्की में तृप्ति देसाई को मामली चोट लगी तो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के पूर्व विधायक भानुदास मुरकुटे के साथ मारपीट की गई।

तृप्ति ने सवाल उठाया, "पुलिस चुप क्यों रही? जब अदालत के समक्ष आश्वासन दिया गया था, तब क्या मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस झूठ बोल रहे थे? उन्हें जरूरी आदेश देना चाहिए था, यह क्यों नहीं किया गया? क्या हम फडणवीस के खिलाफ भी पुलिस शिकायत दर्ज कराएं।"

महिला कार्यकर्ता ने कहा कि महिलाएं शनि शिंगणापुर मंदिर में दर्शन किए बिना गांव से नहीं जाएंगी। जब ग्रामीण ज्यादा हिंसक होने लगे तो पुलिस ने देसाई को एक बैन में बिठाकर वहां से पुणे रवाना कर दिया।

वहीं, शनिवार की सुबह महाराष्ट्र महिला आयोग की अध्यक्ष चित्रा वाघ ने इस मंदिर की अपनी प्रस्तावित यात्रा यह कहते हुए रद्द कर दिया कि मंदिर प्रबंधन के अनुरोध पर उन्होंने ऐसा किया है और वह वहां कानून व्यवस्था कि स्थिति बिगाड़ना नहीं चाहती हैं।

बंबई उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक दूरगामी फैसले में कहा था कि कोई भी कानून पूजास्थलों में महिलाओं को प्रवेश करने से नहीं रोकता। इस मामले में लैंगिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी.एच.वाघेला और न्यायमूर्ति एम.एस.सोनक की पीठ ने यह फैसला एक जनहित याचिका पर दिया था। याचिका सामाजिक कार्यकर्ता विद्या बल और वरिष्ठ वकील नीलिमा वर्तक ने दायर की थी।

इसमें अहमदनगर स्थित शनि शिंगणापुर मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को चुनौती दी गई थी।

जनहित याचिका को निपटाते हुए न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को कानून पालन सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने कहा था कि यह 'महिलाओं का बुनियादी अधिकार है' और इसकी हिफाजत की जानी चाहिए।

राज्य सरकार ने न्यायालय को आश्वासन दिया था कि वह लैंगिक भेदभाव के बिल्कुल खिलाफ है और वह महाराष्ट्र हिदू धर्मस्थल (प्रवेश प्राधिकार) अधिनियम 1956 को पूरी ईमानदारी से लागू करेगी। इस कानून में प्रावधान है कि धर्मस्थल में किसी को रोकने पर छह महीने तक की जेल हो सकती है।

उल्लेखनीय है कि शनिदेव के इस मंदिर में महिलाओं को पूजा करने की अनुमति नहीं है।

इस बीच स्थानीय ग्रामीणों का एक समूह 'शनि मंदिर बचाओ समिति' ने कहा कि वह उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती देगी।

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